त्योहारों का सीजन शुरू होते ही देशभर में मिठास कड़वी होती जा रही है। उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में चीनी के दाम बीते कुछ हफ्तों में तेजी से बढ़े हैं। रक्षाबंधन से ठीक पहले जहां चीनी की खुदरा कीमत 65 रुपये प्रति किलो के पार पहुंच गई, वहीं कुछ इलाकों में यह 68 रुपये किलो तक जा पहुंची है। सिर्फ एक महीने में चीनी करीब 15-20 रुपये प्रति किलो तक महंगी हो चुकी है, जिसने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है।
कितने बढ़ गए हैं दाम
व्यापारियों के मुताबिक, बीते 15 दिनों में ही चीनी के दाम करीब 15 रुपये प्रति किलो तक बढ़ चुके हैं। उत्तर प्रदेश के खुदरा बाजार में 20 अगस्त 2026 को चीनी 65 रुपये प्रति किलो तक बिकी, जिसे अब तक का सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। कुछ स्थानीय बाजारों में तो यह आंकड़ा 68 रुपये प्रति किलो तक भी पहुंच गया है। थोक बाजार में भी असर साफ दिख रहा है — उत्तर प्रदेश में एम-ग्रेड चीनी का एक्स-फैक्ट्री भाव 5,400 रुपये प्रति क्विंटल तक जा पहुंचा है (जिस पर अलग से 5 प्रतिशत जीएसटी भी लगता है), जबकि थोक कीमत 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक दर्ज की गई। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी हफ्तेभर के भीतर चीनी करीब 8 रुपये प्रति किलो तक महंगी हुई है।
दाम बढ़ने की असली वजह क्या है?
चीनी की कीमतों में इस तेजी के पीछे एक नहीं, बल्कि कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं।
1. उत्पादन में बड़ी गिरावट
सबसे बड़ी वजह घरेलू उत्पादन में अनुमान से कहीं ज्यादा गिरावट है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने पहले चालू सीजन (2025-26) में करीब 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था, जो पिछले साल के 296 लाख टन से करीब 16 प्रतिशत ज्यादा था। लेकिन अब यह अनुमान घटाकर करीब 306 लाख टन कर दिया गया है — यानी शुरुआती अनुमान से करीब 37 लाख टन (3.7 मिलियन टन) कम। सरकार के मुताबिक इसकी वजह गन्ने की फसल पर रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों की मार और खराब मौसम है, जिसने खासतौर पर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में गन्ने की पैदावार को बुरी तरह प्रभावित किया।
2. त्योहारी मांग में उछाल
अगस्त से शुरू हुआ त्योहारी सीजन — रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, दशहरा और आगे दिवाली — मिठाइयों और कन्फेक्शनरी उत्पादों की मांग को अचानक बढ़ा देता है। कमजोर उत्पादन के बीच यह बढ़ी हुई मांग बाजार पर दोहरा दबाव बना रही है। व्यापारियों का कहना है कि मौजूदा समय में बाजार की मांग की तुलना में सिर्फ करीब आधी ही चीनी की आपूर्ति हो पा रही है।
3. जमाखोरी का खुलासा
खाद्य मंत्रालय की जांच में एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। 13 अगस्त 2026 को जारी एक पत्र के मुताबिक, चीनी मिलों ने बड़े थोक उपभोक्ताओं (जैसे मिठाई विक्रेता और शीतल पेय निर्माता, जो देश की कुल चीनी खपत का करीब 65 प्रतिशत इस्तेमाल करते हैं) को चीनी बेच तो दी, लेकिन माल की डिलीवरी देने के बजाय उसे अपने गोदामों में ही दबाकर रखा। इस तरह बाजार में कृत्रिम रूप से कमी पैदा करके दाम बढ़ाए गए। इसी खुलासे के बाद सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए 1 सितंबर 2026 से 10 मीट्रिक टन से ज्यादा मासिक खपत वाले बड़े उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक की सीमा घटाकर 15 दिन कर दी है, जो पहले 30 दिन तक हुआ करती थी। यह व्यवस्था 30 नवंबर 2026 तक पूरे देश में लागू रहेगी।
4. इथेनॉल को लेकर बहस, पर सरकार का इनकार
चीनी के दाम बढ़ते ही यह सवाल फिर उठा कि क्या पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए गन्ने और चीनी का बढ़ता इस्तेमाल बाजार में उपलब्धता घटा रहा है। हालांकि सरकार ने इससे साफ इनकार किया है। सरकार का तर्क है कि अगर इथेनॉल की वजह से कमी बढ़ रही होती, तो चीनी का डायवर्जन (यानी चीनी की जगह इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली मात्रा) बढ़ना चाहिए था, जबकि आंकड़ों के मुताबिक यह डायवर्जन घटा है। इसके बावजूद ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन का कहना है कि इथेनॉल की कीमतें लंबे समय से स्थिर हैं, जबकि गन्ने की कीमतों में 2022-23 के बाद से करीब 16 प्रतिशत बढ़ोतरी हो चुकी है — ऐसे में चीनी मिलों के लिए सीधे चीनी बेचना, इथेनॉल बनाने से कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है।
5. अगले सीजन को लेकर चिंता
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों में कमजोर बारिश ने अगले सीजन के गन्ना उत्पादन को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। इससे बाजार में यह आशंका बनी हुई है कि आपूर्ति की समस्या आगे भी बनी रह सकती है, जिसका असर मौजूदा सीजन के क्लोजिंग स्टॉक पर भी पड़ रहा है, जो कई वर्षों के निचले स्तर पर पहुंचने की आशंका है।
आम आदमी को कितना नुकसान
चीनी की महंगाई का सीधा असर हर घर के मासिक बजट पर पड़ रहा है। चाय-कॉफी से लेकर त्योहारी मिठाइयों तक, चीनी रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा है, और इसके दाम बढ़ने से खासतौर पर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर बोझ बढ़ता है। इसके अलावा दो और बातें स्थिति को और मुश्किल बना रही हैं:
- मिठाइयां महंगी: त्योहारी सीजन में मिठाई और पेठा जैसी चीजें भी 30 रुपये प्रति किलो तक महंगी होने का अनुमान है, क्योंकि हलवाई और मिठाई विक्रेता बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डालेंगे।
- विकल्प भी महंगे: चीनी का विकल्प समझा जाने वाला गुड़ भी 100 रुपये प्रति किलो के पार जा चुका है, यानी उपभोक्ताओं के पास सस्ता विकल्प चुनने की गुंजाइश भी सीमित है।
- आगे और बढ़ने की आशंका: व्यापारियों के मुताबिक त्योहारी मांग अभी पूरी तरह चरम पर नहीं पहुंची है, यानी दिवाली तक दाम और बढ़ सकते हैं।
सरकार ने क्या राहत दी है
बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जिनमें सबसे अहम है आयात पर छूट:
- बिना ड्यूटी कच्ची चीनी का आयात: सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक बिना किसी आयात शुल्क के 10 लाख टन तक कच्ची चीनी के आयात की मंजूरी दे दी है। इसका मकसद घरेलू बाजार में जल्द से जल्द अतिरिक्त सप्लाई पहुंचाकर दामों पर लगाम लगाना है।
- स्टॉक लिमिट में सख्ती: जैसा ऊपर बताया गया, बड़े थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की अवधि 30 दिन से घटाकर 15 दिन कर दी गई है, ताकि जमाखोरी और कृत्रिम कमी पर रोक लगाई जा सके।
- निर्यात पर सीमाएं: घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए चीनी के निर्यात को लेकर भी सरकार ने सख्ती बढ़ाई है, ताकि बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे।
आगे क्या उम्मीद की जा सकती है
चीनी के दामों में यह तेजी उत्पादन में कमी, त्योहारी मांग और आपूर्ति श्रृंखला में गड़बड़ियों के मेल से पैदा हुई है। सरकार द्वारा दी गई ड्यूटी-फ्री आयात की छूट और स्टॉक लिमिट जैसे कदमों का असर बाजार में आने में कुछ हफ्तों का समय लग सकता है। तब तक, खासतौर पर दिवाली तक चलने वाले त्योहारी सीजन के दौरान, उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों के साथ ही गुजारा करना पड़ सकता है। इथेनॉल नीति को लेकर छिड़ी बहस भी आने वाले महीनों में सरकार की नीति को प्रभावित कर सकती है, खासकर अगर चीनी मिलें ज्यादा मुनाफे के चलते इथेनॉल की जगह सीधे चीनी बेचना जारी रखती हैं।
