उत्तरप्रदेश में 50 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाले निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी संभालने वाले नियोजन विभाग में निविदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कैबिनेट से निर्धारित निविदा शर्तों को विभागीय स्तर पर बदलकर ऐसी व्यवस्था बनाई गई, जिससे एक कंपनी को उप-ठेकेदार के जरिए बड़े मूल्य के कार्य दिलाने का रास्ता खुल गया। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि जिस व्यवस्था में सब-कॉन्ट्रैक्टर के माध्यम से काम देने का प्रावधान नहीं था, उसमें बाद में बदलाव किए जाने का आरोप है।
शिकायत के अनुसार, जनवरी 2024 में मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली गवर्निंग कमेटी ने निविदा की जिन तकनीकी शर्तों को मंजूरी दी थी, उनमें सब-कॉन्ट्रैक्टर के जरिए काम कराने की अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद 12 मार्च 2026 को विभाग के मुख्य अभियंता की ओर से एक पत्र जारी कर इस व्यवस्था को बदलने का रास्ता तैयार किए जाने का आरोप है। सवाल यह है कि जब मूल निविदा शर्तों में बदलाव का अधिकार उच्च स्तर की मंजूरी से जुड़ा था, तो विभागीय स्तर पर इसमें परिवर्तन कैसे किया गया?
मामले का दूसरा गंभीर पहलू कंपनी की बिड क्षमता और प्रस्तावित काम के मूल्य के बीच का अंतर है। खबर के मुताबिक जिस कंपनी की बिड क्षमता करीब 371 करोड़ रुपये बताई गई, उसके लिए करीब 1600 करोड़ रुपये से अधिक के काम का रास्ता तैयार किया गया। यदि यह तथ्य सही है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी राशि के काम के लिए निर्धारित वित्तीय और तकनीकी पात्रता की शर्तों का पालन किस आधार पर किया गया?
सब-कॉन्ट्रैक्टर की व्यवस्था को लेकर भी विभाग की कार्यप्रणाली कठघरे में है। यदि निविदा की मूल शर्तों में उप-ठेकेदार के जरिए काम देने की अनुमति नहीं थी, तो बाद में इसे शामिल करने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि नियमों में ऐसा परिवर्तन आवश्यक था तो उसे पहले सक्षम स्तर से अनुमोदित कराने के बजाय बाद में मंजूरी लेने की प्रक्रिया क्यों अपनाई गई?
मामले में शिकायत होने के बाद अपर मुख्य सचिव आलोक कुमार ने कहा है कि गवर्निंग कमेटी में सब-कॉन्ट्रैक्टर को अनुमोदित नहीं किया गया था और मामले की जांच कर कार्रवाई की जाएगी।
पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी निर्माण कार्यों में निविदा की शर्तें पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए बनाई जाती हैं या उन्हें जरूरत के मुताबिक बदलकर किसी खास कंपनी के लिए रास्ता बनाया जा सकता है? यदि जांच में नियमों को दरकिनार कर पात्रता या निविदा शर्तों में बदलाव की पुष्टि होती है, तो यह केवल एक विभागीय चूक नहीं बल्कि सार्वजनिक धन के इस्तेमाल और सरकारी ठेकों की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
1600 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित काम, 371 करोड़ रुपये के आसपास की बताई गई बिड क्षमता और निविदा शर्तों में बाद में किए गए कथित बदलाव—इन तीनों तथ्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। सरकारी ठेकों में नियम इसलिए बनाए जाते हैं ताकि किसी कंपनी को लाभ पहुंचाने की गुंजाइश न रहे। इसलिए जांच का दायरा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि नियम बदले गए या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि नियम बदलने से किसे लाभ मिलने वाला था और क्या इससे पूरी निविदा प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
