आईटी सिटी योजना की एनओसी के नाम पर 2.60 करोड़ मांगने का आरोप, 15 लाख नकद और 25 लाख के दो चेक लेने के बाद भी नहीं हुआ काम — डेढ़ महीने पहले ही विजिलेंस ने जेई को रंगे हाथ पकड़ा था
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) में भ्रष्टाचार थमने का नाम नहीं ले रहा। अगस्त में विजिलेंस की छापेमारी और गिरफ्तारियों के बाद भी तस्वीर नहीं बदली — इसका ताजा सबूत सोमवार को खुद प्राधिकरण मुख्यालय में देखने को मिला, जहां अफसरों के कमरों के ठीक बाहर एक कर्मचारी और प्रॉपर्टी डीलर के बीच जमकर मारपीट हो गई। वजह थी ढाई करोड़ रुपये से ज्यादा की कथित घूस का लेनदेन।
क्या है मामला
एलडीए की महत्वाकांक्षी आईटी सिटी योजना की जमीन की एनओसी दिलाने के नाम पर 2.60 करोड़ रुपये मांगने का आरोप सामने आया है। प्रॉपर्टी डीलर मनोज सिंह का कहना है कि आईटी सिटी योजना में स्थित उसकी काफी जमीन है और एनओसी दिलाने के लिए एलडीए के बाबू दीपक शर्मा ने उससे 2.60 करोड़ रुपये का सौदा किया। मनोज सिंह के मुताबिक उसने फरवरी में 15 लाख रुपये नकद दिए, इसके अलावा 20 लाख और पांच लाख रुपये के दो चेक भी दिए — लेकिन एनओसी आज तक नहीं मिली। उसका दावा है कि महीनों तक उसे सिर्फ भरोसा दिलाया जाता रहा कि काम हो जाएगा।
पैसा वापस मांगने पर विवाद इस कदर बढ़ा कि सोमवार को मुख्यालय में ही दोनों पक्ष भिड़ गए। दूसरी तरफ आरोपी बाबू ने उल्टे प्रॉपर्टी डीलर पर ही पैसा वापस न करने का आरोप लगाया।
सचिव के सामने पेश हुए दोनों पक्ष
मारपीट के बाद घायल मनोज सिंह एलडीए वीसी कार्यालय पहुंचा। सूचना पर पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। बाद में दोनों पक्षों को सचिव सुशील प्रताप सिंह के सामने पेश किया गया, जहां प्रॉपर्टी डीलर ने अपने आरोप दोहराए और दावा किया कि उसके पास बातचीत की रिकॉर्डिंग मौजूद है।
पैटर्न बन चुका है भ्रष्टाचार
यह कोई इकलौता मामला नहीं है, और यही सबसे बड़ी चिंता है। महज डेढ़ महीने पहले, 1 अगस्त को, विजिलेंस टीम ने एलडीए के अवर अभियंता दिनेश कुमार वर्मा, सुपरवाइजर चंद्र प्रकाश और बिचौलिए श्रवण कुमार को साढ़े सात लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था। यह रकम एक कमर्शियल प्रॉपर्टी के अवैध निर्माण पर कार्रवाई रोकने के एवज में मांगी गई थी, और कुल मांग 15 लाख रुपये की बताई गई थी। बाद में शासन ने जेई दिनेश वर्मा को निलंबित कर विभागीय जांच के आदेश दिए, जबकि पंप ऑपरेटर को प्राधिकरण पहले ही निलंबित कर चुका था।
उस मामले की जांच में जो सामने आया, वह और भी गंभीर था। पूछताछ में आरोपियों ने वसूली का पूरा खेल कबूला और कुछ और नाम भी बताए — यानी प्राधिकरण में एक नहीं, कई अलग-अलग गिरोह सक्रिय हैं, जिनमें अधिकारी, कर्मचारी और बिचौलिए शामिल हैं। तरीका तय है: पहले शिकायत कराई जाती है, फिर वसूली के लिए दबाव बनाया जाता है। इसके बाद विजिलेंस ने मुख्यालय पहुंचकर दस्तावेज खंगाले और 11 इंजीनियरों तथा एक पीसीएस अधिकारी के खिलाफ शुरुआती जांच शुरू की। जांच के दायरे में आईजीआरएस पोर्टल पर लगातार शिकायत दर्ज कराने वाले कथित शिकायतकर्ताओं की भूमिका भी आई।
सवालों के घेरे में कार्यप्रणाली
ताजा घटनाक्रम ने प्राधिकरण के अर्जन विभाग के अफसरों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह भी है कि जब विजिलेंस की कार्रवाई और निलंबन के बाद प्राधिकरण में “हड़कंप” मचा था, तब भी करोड़ों की डील बेरोकटोक कैसे चलती रही? उपाध्यक्ष स्तर से बार-बार दोहराया जाता रहा है कि भ्रष्टाचार में संलिप्त किसी अधिकारी या कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा — लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आरोप अब मुख्यालय के गलियारों में हाथापाई तक पहुंच चुके हैं।
आम आवंटी और जमीन मालिक के लिए इसका मतलब साफ है: एनओसी, नक्शा, कब्जा या कार्रवाई — हर फाइल के पीछे एक ‘रेट’ की चर्चा है। जब तक इन मामलों में केवल निलंबन और विभागीय जांच तक कार्रवाई सीमित रहेगी और सिस्टम में पारदर्शिता (ऑनलाइन ट्रैकिंग, समयबद्ध निस्तारण, जवाबदेही तय करना) नहीं आएगी, तब तक एक मामला दबेगा और दूसरा खड़ा हो जाएगा।
