ऐप से टैक्सी बुक करने का चलन बढ़ा, तो उसके साथ ड्राइवरों की शिकायतें भी बढ़ीं: भारी कमीशन, तय आमदनी का अभाव और कंपनियों की मनमानी। यात्रियों को भी पीक ऑवर में बढ़े हुए किराये की मार झेलनी पड़ती है। इन्हीं शिकायतों के बीच ‘भारत टैक्सी’ एक अलग मॉडल के साथ सामने आई है।
क्या है भारत टैक्सी?
यह देश का पहला सहकारी टैक्सी नेटवर्क है, जिसे केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन में विकसित किया गया है। इसमें ड्राइवर केवल सेवा देने वाले नहीं, बल्कि शेयरधारक और सह-मालिक भी होते हैं। इसका संचालन सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड (STCL) करती है। फरवरी 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली-एनसीआर से इसकी शुरुआत की थी, और अब यह सेवा अलग-अलग शहरों में पहुँच रही है।
जीरो कमीशन’ का मतलब
इस मॉडल का सबसे बड़ा दावा यही है। निजी कैब कंपनियों के उलट, इसमें पूरा किराया सीधे ड्राइवर को मिलता है। किराया ड्राइवर के बैंक खाते में जाता है, ऐप में कंपनी का कोई वॉलेट नहीं है और सर्ज प्राइसिंग भी नहीं है।
इसका मतलब यह नहीं कि ड्राइवरों को कुछ भी नहीं देना पड़ता। ड्राइवरों को केवल दैनिक, साप्ताहिक या मासिक शुल्क देना होगा, जो बहुत कम बताया गया है। कंपनी के सीईओ के अनुसार फिलहाल कोई सर्विस चार्ज नहीं लिया जा रहा, पर भविष्य में रोज़ के 25 से 30 रुपये लिए जा सकते हैं। यानी यह कमीशन की जगह एक छोटा तय शुल्क है, जो हर राइड की कमाई के अनुपात में नहीं बढ़ता।
यात्रियों को क्या फायदा?
- कोई सर्ज प्राइसिंग नहीं: दफ्तर आने-जाने के समय जब निजी कंपनियों की कैब महँगी हो जाती है, तब भी किराया नहीं बढ़ेगा।
- सुरक्षा: राइडर को एक्सीडेंट और इंश्योरेंस कवरेज जैसी सुविधाएँ भी दी जाती हैं।
- भाषा: ऐप हिंदी, गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी में उपलब्ध है।
लखनऊ में शुरुआत
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को लखनऊ में इस सेवा का शुभारंभ किया। लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और प्रयागराज में इसका संचालन शुरू किया गया है। लखनऊ एयरपोर्ट, लखनऊ मेट्रो और लखनऊ पुलिस समेत विभिन्न संस्थाओं के साथ एमओयू भी हुए हैं। उन्होंने इसे सहकारिता मंत्रालय के गठन का नतीजा बताया। उप-मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने ड्राइवरों से कहा कि वे निजी कंपनियों के लिए काम करने के बजाय अपनी टैक्सी चलाकर मालिक बनें। इससे पहले चंडीगढ़ में भी इस सेवा की शुरुआत की तैयारी की खबर आई थी। सरकार के अनुसार जुलाई तक देशभर में करीब 7.97 लाख ड्राइवर-पार्टनर प्लेटफॉर्म से जुड़ चुके हैं।
आगे की चुनौतियाँ
ड्राइवर का मालिक बनना और जीरो कमीशन सुनने में आकर्षक हैं, पर असली परीक्षा ज़मीन पर होगी। ये सवाल अभी खुले हैं (यह इस लेख का विश्लेषण है, किसी रिपोर्ट का निष्कर्ष नहीं):
- राइड की उपलब्धता: ड्राइवर तभी जुड़े रहेंगे जब उन्हें पर्याप्त बुकिंग मिलेगी, और यात्री तभी टिकेंगे जब कैब जल्दी मिलेगी।
- ऐप की विश्वसनीयता: ओला-उबर ने सालों में ऐप, नक्शे और भुगतान की प्रणाली मज़बूत की है। भारत टैक्सी को इस स्तर तक पहुँचना होगा।
- आर्थिक टिकाऊपन: कमीशन के बिना संचालन का खर्च छोटे शुल्क और सहकारी ढाँचे से कैसे निकलेगा, यह समय के साथ साफ होगा।
निष्कर्ष
भारत टैक्सी शहरी परिवहन में एक बड़े सवाल का जवाब देने की कोशिश है: मुनाफे का बड़ा हिस्सा प्लेटफॉर्म के पास जाए या गाड़ी चलाने वाले के पास। अगर यह मॉडल भरोसेमंद सेवा और बेहतर कमाई दोनों दे पाया, तो ऐप-आधारित टैक्सी बाज़ार में ड्राइवरों की भूमिका बदल सकती है। फिलहाल यात्रियों के लिए राहत की बात यह है कि उनके पास एक और विकल्प है।
अगर आप चाहें तो मैं इसे किसी खास अखबार या वेबसाइट की शैली और शब्द-सीमा में ढालकर फाइल के रूप में दे सकता हूँ।
