सरकारी सेवा में कार्यरत किसी कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान असामयिक मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार को आर्थिक संकट से उबारने के लिए “अनुकम्पा नियुक्ति” या “मृतक आश्रित भर्ती” की व्यवस्था बनाई गई है। इसका मूल उद्देश्य यह है कि जिस परिवार ने कमाने वाले सदस्य को खोया है, उसे तत्काल किसी सरकारी पद पर नियुक्ति देकर आर्थिक सहारा दिया जाए। लेकिन जब यह नियुक्ति पुलिस, पीएसी या अन्य ऐसे विभागों में होती है जहाँ शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) अनिवार्य होती है, तो यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या मृतक आश्रितों को इस परीक्षा से छूट दी जानी चाहिए। यह विषय पिछले कुछ वर्षों से नीतिगत बहस, प्रशासनिक निर्देशों और न्यायिक हस्तक्षेप के केंद्र में बना हुआ है।
मृतक आश्रित भर्ती योजना का उद्देश्य
अनुकम्पा नियुक्ति की नीति के पीछे मूल भावना कल्याणकारी है। यह किसी अभ्यर्थी के “अधिकार” के रूप में नहीं, बल्कि मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल राहत पहुँचाने के एक कल्याणकारी उपाय के रूप में देखी जाती है। इसीलिए सामान्य भर्ती प्रक्रिया की तुलना में इसमें कई रियायतें दी जाती हैं — जैसे विज्ञापन के बिना नियुक्ति, प्रतीक्षा सूची में प्राथमिकता, और कुछ मामलों में आयु सीमा में छूट। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि कोई नियोक्ता प्रक्रियागत देरी का सहारा लेकर अनुकम्पा नियुक्ति के दावे को खारिज नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करने से इस कल्याणकारी योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
शारीरिक दक्षता परीक्षा क्यों जरूरी मानी जाती है
पुलिस, पीएसी, अर्धसैनिक बल जैसे विभागों में शारीरिक दक्षता परीक्षा को अनिवार्य इसलिए रखा गया है क्योंकि इन पदों के दायित्व शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होते हैं — दौड़, गश्त, कानून-व्यवस्था में तैनाती आदि के लिए एक निश्चित शारीरिक क्षमता आवश्यक मानी जाती है। यही कारण है कि सामान्य भर्ती में जहाँ शैक्षणिक योग्यता में छूट आसानी से मिल जाती है, वहीं शारीरिक दक्षता के मानकों में ढील देने पर विभाग हमेशा सतर्क रहते हैं।
छूट की मांग के पीछे तर्क
मृतक आश्रित कोटे के अभ्यर्थियों के लिए PET में छूट की मांग करने वालों का तर्क है कि:
- ये अभ्यर्थी सामान्य प्रतिस्पर्धी भर्ती से नहीं आते, बल्कि पारिवारिक त्रासदी के बाद आजीविका की तत्काल आवश्यकता के कारण आवेदन करते हैं।
- अक्सर ऐसे अभ्यर्थियों की उम्र सामान्य भर्ती अभ्यर्थियों से अधिक होती है, कई बार 40-45 वर्ष तक, जिससे कठोर शारीरिक मापदंडों पर खरा उतरना कठिन हो जाता है।
- योग्यता जांचने के लिए वैकल्पिक और आधुनिक तरीके अपनाए जा सकते हैं, ताकि दक्षता की जरूरत भी पूरी हो और परिवार को नियुक्ति से वंचित भी न होना पड़े।
उत्तर प्रदेश में स्थिति: घोषणा और क्रियान्वयन का अंतर
उत्तर प्रदेश में मृतक आश्रित कोटे से पुलिस और पीएसी में भर्ती होने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से चर्चा में रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर निर्देश दिया था कि मृतक आश्रित कोटे से भर्ती होने वाले अभ्यर्थियों को शारीरिक दक्षता परीक्षा में छूट दी जाए और उनकी योग्यता जांचने के लिए आधुनिक तरीके अपनाए जाएं। हालाँकि, रिपोर्टों के अनुसार इस निर्देश के दो साल बाद भी गृह विभाग ने संबंधित नियमों में संशोधन नहीं किया, जिसके चलते मृतक आश्रित कोटे के अभ्यर्थियों को अब भी नियमित PET से गुजरना पड़ रहा है। यह स्थिति दिखाती है कि नीतिगत घोषणाओं और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अक्सर लंबा फासला रह जाता है, जिसका खामियाजा अंततः उन परिवारों को भुगतना पड़ता है जो पहले ही मुखिया खो चुके हैं।
न्यायपालिका का दृष्टिकोण
अदालतों ने इस विषय पर संतुलित रुख अपनाया है — छूट पूर्ण नहीं दी जाती, लेकिन वास्तविक कठिनाइयों को नजरअंदाज भी नहीं किया जाता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मृतक आश्रित कोटे की नियुक्तियों को लेकर स्पष्ट किया कि आयु सीमा में छूट का लाभ केवल विधवा को विशेष परिस्थितियों में ही मिल सकता है, पुत्र या पुत्री को अधिकतम आयु सीमा में सामान्यतः छूट नहीं दी जा सकती। इससे स्पष्ट होता है कि अदालतें रियायतों को नीति-निर्धारकों के विवेकाधिकार का विषय मानती हैं, न कि हर मामले में स्वतः लागू होने वाला अधिकार।
राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जो अभ्यर्थी बीमारी, गर्भावस्था या भारी बारिश जैसी वास्तविक और अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण निर्धारित शारीरिक दक्षता परीक्षा में शामिल नहीं हो सके, उन्हें दोबारा परीक्षा देने का एक अवसर दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत सामान्य रूप से सभी अभ्यर्थियों के लिए भर्ती प्रक्रिया दोबारा खोलने का आदेश नहीं है, बल्कि केवल विशेष और असाधारण मामलों तक सीमित है। प्रशासनिक बोझ को संतुलित करने के लिए कोर्ट ने दोबारा अवसर पाने वाले अभ्यर्थियों पर एक निश्चित शुल्क भी तय किया।
यह दर्शाता है कि अदालतें शारीरिक दक्षता परीक्षा की अनिवार्यता को समाप्त करने के बजाय, असाधारण परिस्थितियों में सीमित राहत देने का मार्ग अपनाती हैं।
अन्य राज्यों का अनुभव
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हाईकोर्ट ने अनुकम्पा नियुक्ति से जुड़े मामलों में बार-बार यह रेखांकित किया है कि यह योजना मृतक कर्मचारी के परिवार को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए है, इसलिए विभागों को तकनीकी आधारों पर इसे रोकने से बचना चाहिए। हालाँकि, न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता जैसी बुनियादी शर्तों में छूट को लेकर भी अदालतों ने सतर्क रुख अपनाया है — यानी कल्याणकारी उद्देश्य के बावजूद पद के लिए आवश्यक न्यूनतम मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
चुनौतियाँ
इस मुद्दे पर छूट देने के रास्ते में कई व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं:
- पद की प्रकृति बनाम कल्याणकारी उद्देश्य: पुलिस जैसे बलों में शारीरिक क्षमता सीधे कर्तव्य-निर्वहन से जुड़ी है, इसलिए इसमें पूर्ण छूट देना परिचालन दक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है।
- समानता का प्रश्न: यदि मृतक आश्रित कोटे को छूट दी जाती है तो सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थी इसे असमान व्यवहार के रूप में चुनौती दे सकते हैं।
- नीति और क्रियान्वयन में अंतर: जैसा उत्तर प्रदेश के उदाहरण में देखा गया, शीर्ष स्तर से निर्देश जारी होने के बावजूद संबंधित सेवा नियमों में औपचारिक संशोधन न होने से जमीनी स्तर पर राहत नहीं पहुँच पाती।
- वैकल्पिक मूल्यांकन तंत्र का अभाव: “आधुनिक तरीकों” से योग्यता जांचने की बात कही तो जाती है, पर ऐसा कोई ठोस, मानकीकृत वैकल्पिक ढाँचा अब तक व्यापक रूप से लागू नहीं हो पाया है।
आगे का रास्ता
एक संतुलित समाधान यह हो सकता है कि:
- मृतक आश्रित कोटे के अभ्यर्थियों के लिए शारीरिक दक्षता के मानकों में पूर्ण छूट के बजाय, आयु और परिस्थिति के अनुसार श्रेणीबद्ध रियायत (जैसे समय-सीमा में छूट, कम दूरी/समय के मानक) पर विचार हो।
- विशेष प्रशिक्षण अवधि देकर अभ्यर्थियों को परीक्षा हेतु तैयार करने की व्यवस्था की जाए।
- नीति संबंधी घोषणाओं को समयबद्ध तरीके से सेवा नियमों में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए, ताकि मौखिक निर्देश और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच का अंतराल समाप्त हो।
- गैर-क्षेत्रीय/कार्यालयीन प्रकृति के पदों की पहचान कर वहाँ मृतक आश्रितों को प्राथमिकता से समायोजित किया जाए, जहाँ शारीरिक दक्षता की अनिवार्यता व्यावहारिक रूप से कम प्रासंगिक हो।
मृतक आश्रित भर्ती में शारीरिक दक्षता से छूट का मुद्दा कल्याणकारी उद्देश्य और सेवा की व्यावसायिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन का प्रश्न है। सरकारें और अदालतें दोनों ही इस बात को स्वीकार करती हैं कि मृतक आश्रितों की परिस्थिति सामान्य अभ्यर्थियों से भिन्न है, परंतु साथ ही यह भी मानती हैं कि पद की मूल अपेक्षाओं से पूरी तरह मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। जब तक नीतिगत घोषणाओं को ठोस, समयबद्ध और स्पष्ट सेवा-नियमों में नहीं बदला जाता, तब तक ऐसे परिवारों को राहत केवल कागजों तक सीमित रहने का खतरा बना रहेगा।
