सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चला आ रहा विवाद अब एक नए और अहम मोड़ पर पहुंच गया है। हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) ने इस मसले पर पाकिस्तान के पक्ष में फैसला सुनाया है, लेकिन भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है।
मामला क्या है?
सिंधु जल संधि क्या है? यह भारत-पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हुआ एक जल-बंटवारा समझौता है, जिसे विश्व बैंक की मध्यस्थता से अंतिम रूप दिया गया था। यह संधि सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज — इन छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को नियंत्रित करती है।
विवाद शुरू कैसे हुआ? जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी की बैठक में सख्त फैसला लेते हुए इस संधि को स्थगित कर दिया था। भारत ने पाकिस्तान को औपचारिक रूप से चिट्ठी भेजकर इसकी सूचना भी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर स्पष्ट कहा था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।”
हेग कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
31 अगस्त 2026 को हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह प्रभावी है और भारत इसके तहत अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने भारत के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि आतंकी हमले जैसे आधार पर संधि को निलंबित या समाप्त किया जा सकता है। कोर्ट ने संधि के तहत अंतरिम उपायों से जुड़ा एक विस्तृत आदेश (अवार्ड) जारी किया, जो सीधे तौर पर पाकिस्तान के पक्ष में और भारत के स्थगन के फैसले के खिलाफ जाता है।
भारत ने इसे क्यों नहीं माना?
भारत ने इस फैसले को दो टूक खारिज करते हुए तीन मुख्य आधार गिनाए:
- अवैध गठन: भारत का कहना है कि यह ट्रिब्यूनल विश्व बैंक द्वारा सिंधु जल संधि की शर्तों के स्पष्ट उल्लंघन में गठित किया गया था, इसलिए इसका कोई कानूनी अस्तित्व ही नहीं है।
- अधिकार क्षेत्र नहीं: विदेश मंत्रालय के अनुसार इस “तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन” को भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं है।
- समानांतर प्रक्रिया अस्वीकार्य: भारत का कहना है कि किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मतभेदों को सुलझाने के लिए संधि के तहत तय प्रक्रिया केवल ‘निष्पक्ष विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) तंत्र है, न कि यह आर्बिट्रेशन कोर्ट। एक ही विवाद पर दो समानांतर कार्यवाही एक साथ नहीं चल सकतीं।
इन्हीं आधारों पर भारत ने शुरू से इस मध्यस्थता प्रक्रिया में हिस्सा लेने से इनकार किया है और अब भी कोर्ट के इस ताज़ा आदेश को मानने से इनकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा, “सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का भारत का फैसला लागू रहेगा।”
क्या यह फैसला बाध्यकारी है?
तकनीकी रूप से देखा जाए तो परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन कोई स्थायी अदालत नहीं, बल्कि एक अंतर-सरकारी मध्यस्थता संस्था है जो सिर्फ प्रशासनिक सहायता और ट्रिब्यूनल गठन की सुविधा देती है। इसके फैसलों की बाध्यता पूरी तरह पक्षकारों की आपसी सहमति पर निर्भर करती है, और इसके पास खुद कोई प्रवर्तन तंत्र, पुलिस या सैन्य शक्ति नहीं है जो अपना फैसला जबरन लागू करवा सके। यही वजह है कि भारत इसे “गैर-बाध्यकारी” बता रहा है।
भारत के लिए व्यावहारिक तौर पर क्या बदलेगा?
- जमीनी स्तर पर तत्काल कोई असर नहीं: विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के इस आदेश का भारत की जल परियोजनाओं या संप्रभु कार्यों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यानी भारत अपनी नदी-जल नीति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं करने वाला।
- संधि स्थगन जारी रहेगा: भारत का रुख साफ है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर पूरी तरह और स्थायी रूप से लगाम नहीं लगाता, तब तक सिंधु जल संधि स्थगित ही रहेगी।
- कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा: भले ही फैसला बाध्यकारी न हो, लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत के खिलाफ आया यह आदेश पाकिस्तान को कूटनीतिक स्तर पर भारत पर दबाव बनाने और वैश्विक जनमत को अपने पक्ष में करने का एक हथियार जरूर देता है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार उठा सकता है।
- कानूनी और कूटनीतिक टकराव जारी रहेगा: चूंकि भारत अदालत के गठन को ही अवैध मानता है और अदालत भारत की इस दलील को खारिज कर चुकी है, आगे भी इस मुद्दे पर कानूनी और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर टकराव जारी रहने की आशंका है।
- छवि से जुड़ी चुनौती: पाकिस्तान के साथ-साथ अब बांग्लादेश भी गंगा जल संधि और तीस्ता जल मुद्दे को लेकर संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों तक पहुंचने की तैयारी में बताया जा रहा है, जिससे भारत को जल-कूटनीति के मोर्चे पर एक साथ कई दिशाओं से घेरने की कोशिश जैसी स्थिति बन सकती है।
भारत का उदाहरण या तर्क: चीन से तुलना
भारत का यह रुख अकेला उदाहरण नहीं है। 2016 में दक्षिण चीन सागर विवाद को लेकर हेग ट्रिब्यूनल ने फिलीपींस के पक्ष में और चीन के खिलाफ फैसला सुनाया था, लेकिन चीन ने उसी दिन इसे अवैध, शून्य और गैर-बाध्यकारी बताते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया था। एक दशक बाद भी चीन उसी रुख पर कायम है और अपने दावों पर अड़ा हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि भारत भी सिंधु जल मसले पर अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि मानते हुए इसी तरह का रुख अपना रहा है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल दोनों पक्षों — भारत और अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल — के बीच स्थिति एकदम विपरीत बनी हुई है। कोर्ट ने संधि को लागू बताकर भारत की जिम्मेदारियां तय करने की कोशिश की है, जबकि भारत ने अदालत के गठन को ही अवैध करार दिया है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि:
- पाकिस्तान इस फैसले का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर दबाव बनाने के लिए किस तरह करता है।
- भारत अपने रुख पर कायम रहते हुए आगे कोई नई कूटनीतिक या कानूनी रणनीति अपनाता है या नहीं।
- सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की तरफ से कोई ठोस कदम उठाया जाता है या नहीं, जो इस पूरे विवाद की जड़ में है।
फिलहाल के लिए इतना साफ है कि भारत की जमीनी नीति और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने के फैसले में तत्काल कोई बदलाव नहीं आने वाला, भले ही अंतरराष्ट्रीय मंच पर फैसला पाकिस्तान के पक्ष में क्यों न आया हो।