देश की सबसे बड़ी अदालत ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन से जुड़ा एक बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इस प्रदर्शन से जुड़ी सभी FIR रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 5 सितंबर को प्रस्तावित अपने दिल्ली मार्च को भी वापस ले लिया।
पूरा मामला क्या था
यह पूरा आंदोलन 20 जून 2026 को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था। यह प्रदर्शन नीट-यूजी (NEET-UG) परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ छात्रों की तरफ से किया जा रहा था। शुरुआत में छात्रों की सबसे बड़ी मांग तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा थी। धीरे-धीरे यह आंदोलन एक बड़े छात्र आंदोलन में तब्दील हो गया और जंतर-मंतर से निकलकर कई शहरों तक फैल गया।
20 से 25 जुलाई के बीच हुए इन प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली और अन्य राज्यों में कई FIR दर्ज की गई थीं। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और सरकार ने पार्टी की बाकी मांगें भी मान लीं, जिसके बाद उसी दिन आंदोलन समाप्त कर दिया गया था। लेकिन आंदोलन के दौरान दर्ज हुई FIR का मामला अदालत में पहुंच गया था, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए 20 से 25 जुलाई के बीच हुए इन प्रदर्शनों से जुड़ी कुल 13 FIR को रद्द करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि दिल्ली पुलिस के अलावा बिहार, असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र सरकार ने भी छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल किए थे।
हालांकि, साथ ही सरकार की तरफ से यह भी बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान 2,873 ऐसे लोग वहां मौजूद थे, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड (क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स) पहले से रहा है। पुलिस ने इन्हीं लोगों के खिलाफ एक सीमित जांच के लिए नई FIR दर्ज करने की अनुमति भी मांगी थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्ति का इस्तेमाल किया और दिल्ली के साथ-साथ असम, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और बिहार में दर्ज इन सभी FIR को रद्द करने का आदेश दे दिया।
फैसले की मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर आंदोलन से जुड़ी सभी FIR रद्द कर दी हैं।
- कोर्ट ने साफ कहा है कि इस मामले में अब कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी।
- हालांकि, सरकार के मुताबिक जिन 2,873 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड पाया गया था, उनमें से जिन लोगों ने प्रदर्शन के दौरान मारपीट की या सार्वजनिक/निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, उन पर मामला पहले की तरह चलता रहेगा। यानी यह राहत सामान्य प्रदर्शनकारियों और छात्रों के लिए है, हिंसा में सीधे तौर पर शामिल पाए गए लोगों के लिए नहीं।
- यह भी स्पष्ट किया गया है कि नीट परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल छात्रों से जुड़ा यह मामला एक अलग याचिका से जुड़ा है, जिसे पहले वाले मामलों से अलग समझा जाना चाहिए।
CJP ने वापस लिया 5 सितंबर का मार्च
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से ठीक पहले कॉकरोच जनता पार्टी ने 5 सितंबर को दिल्ली में एक बड़े मार्च का ऐलान कर रखा था। लेकिन केंद्र सरकार के आश्वासन और अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पार्टी ने अपने इस प्रस्तावित मार्च को पूरी तरह वापस ले लिया है। पार्टी की तरफ से इसे छात्रों और प्रदर्शनकारियों के लिए एक बड़ी कानूनी राहत के तौर पर देखा जा रहा है।
क्यों अहम है यह फैसला
यह मामला केवल कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों के नजरिए से भी अहम माना जा रहा है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले हजारों छात्रों और आम लोगों के खिलाफ दर्ज हुई FIR रद्द होने से उन पर लंबी कानूनी कार्रवाई और आपराधिक रिकॉर्ड का खतरा टल गया है। साथ ही, अदालत ने यह संतुलन भी बनाए रखा है कि जिन लोगों ने वाकई हिंसा या तोड़फोड़ की, उन पर कार्रवाई जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को छात्र आंदोलनों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल के तौर पर भी देखा जा रहा है।
