पश्चिम एशिया में जारी तनाव और स्ट्रेट ऑफ होरमुज में लगातार बनी अनिश्चितता के बावजूद आगामी रबी (सर्दियों की बुवाई) सीजन के लिए भारत की उर्वरक आपूर्ति सुरक्षित नजर आ रही है। हाल ही में हुए यूरिया आयात टेंडर में जरूरत से कहीं अधिक बोलियां मिलना इस बात का संकेत है कि आपूर्ति को लेकर चिंताएं अब कम हो रही हैं। यह जानकारी उद्योग जगत के अधिकारियों और विश्लेषकों के हवाले से सामने आई है।
अगस्त में क्यों अहम होता है टेंडर का समय
उर्वरक कंपनियां आमतौर पर अगस्त महीने में ही आयात के सौदे पक्के कर लेती हैं, ताकि माल सितंबर-अक्टूबर तक भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच जाए — ठीक उसी वक्त जब रबी सीजन की बुवाई के लिए मांग सबसे ज्यादा होती है। यही वजह है कि इस साल का टेंडर टाइमिंग और उसमें मिली प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (आरसीएफ) ने 29 जुलाई को 17 लाख टन बल्क यूरिया आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया था। इसमें से 10 लाख टन पश्चिमी तट के लिए और 7 लाख टन पूर्वी तट के लिए रखा गया, जबकि प्रतिबंधित देशों के आपूर्तिकर्ताओं को इससे बाहर रखा गया। बोलियां 11 अगस्त को बंद हुईं और सितंबर डिलीवरी के लिए जरूरी मात्रा से काफी अधिक बोलियां प्राप्त हुईं। एस एंड पी ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स की एग्रीबिजनेस कंसल्टिंग की एसोसिएट डायरेक्टर स्वाति माथुर के हवाले से बाजार सूत्रों ने यह जानकारी दी। सफल आपूर्तिकर्ताओं को 24 सितंबर तक सभी शिपमेंट पूरे करने होंगे।
घरेलू उत्पादन और आयात का गणित
भारत को सालाना करीब 3.9 करोड़ टन यूरिया की जरूरत होती है, जिसमें से करीब तीन-चौथाई हिस्सा देश में ही उत्पादित होता है और बाकी करीब 80 लाख टन आयात किया जाता है। पश्चिम एशिया के संघर्ष ने शुरुआत में चिंता इसलिए बढ़ाई थी क्योंकि भारत के आयातित यूरिया का करीब 70 प्रतिशत और घरेलू यूरिया उत्पादन के मुख्य कच्चे माल — तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का करीब 60 प्रतिशत — सामान्यतः स्ट्रेट ऑफ होरमुज से होकर गुजरता है।
कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बाद अब राहत
इस साल यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। फरवरी 2026 में आरसीएफ के टेंडर में करीब 508-512 डॉलर प्रति टन का भाव तय हुआ था। लेकिन खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने और स्ट्रेट ऑफ होरमुज में जहाजों के फंसने से अप्रैल 2026 आते-आते यह भाव लगभग दोगुना होकर 935-959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया था। उस दौर में दर्जनों जहाज होरमुज जलडमरूमध्य के पार फंसे रह गए थे, जिससे आरसीएफ को अपने पहले के टेंडर की डिलीवरी तारीखें तक बढ़ानी पड़ी थीं।
हालांकि इसके बाद स्थिति में सुधार आया। जून 2026 के टेंडर में नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) को करीब 449 डॉलर प्रति टन का भाव मिला, जो अप्रैल के उच्चतम स्तर से लगभग आधा था। और अब अगस्त के ताजा टेंडर में यह भाव और नीचे आकर करीब 390-400 डॉलर प्रति टन के आसपास तय होने की उम्मीद जताई जा रही है — जो इस साल के सबसे निचले स्तरों में से एक है। बाजार जानकारों के मुताबिक यह स्तर होरमुज से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं में स्पष्ट नरमी को दिखाता है।
आयात के मोर्चे पर तेजी
पश्चिम एशिया संकट के दौरान भारत ने घरेलू भंडार मजबूत करने के लिए आयात में भी तेजी दिखाई। अप्रैल से जून 2026 के बीच भारत का यूरिया आयात 25.1 लाख टन तक पहुंच गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा केवल 8.4 लाख टन था। यह दिखाता है कि सरकार ने वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद समय रहते भंडार बढ़ाने की दिशा में सक्रियता दिखाई।
आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश
समुद्री मार्गों में बाधा आने के बाद भारत ने अपने परंपरागत खाड़ी आपूर्तिकर्ताओं से आगे बढ़कर उर्वरक आयात के स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास तेज किए। उद्योग के अनुमानों के अनुसार भारत इस साल अब तक 50 लाख टन से अधिक यूरिया के लिए अनुबंध कर चुका है, जो उसके अनुमानित आयात का करीब दो-तिहाई हिस्सा है।
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि उर्वरक विभाग ने विदेशों में भारतीय मिशनों के माध्यम से नए सोर्सिंग अवसर तलाशकर खरीद प्रयासों का विस्तार किया है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके। अधिकारी के अनुसार, इन कदमों का मकसद उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना, वैश्विक बाजार में आने वाली गड़बड़ियों से उत्पन्न होने वाली कमजोरियों को घटाना और देश में उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
इसी कड़ी में भारतीय उर्वरक कंपनियों ने सऊदी अरब की फर्मों के साथ डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) की सालाना करीब 31 लाख टन आपूर्ति के लिए दीर्घकालिक समझौते भी अंतिम रूप दे दिए हैं।
यूरिया का विकल्प तलाशने की नीति
कीमतों में भारी उछाल के दौर में सरकार ने एक और रणनीतिक कदम उठाया — किसानों को यूरिया के बजाय अमोनियम सल्फेट जैसे नाइट्रोजन स्रोत अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना। इसी रबी सीजन से अमोनियम सल्फेट को उर्वरक सब्सिडी योजना में भी शामिल कर दिया गया है, ताकि किसानों के बीच इसका इस्तेमाल बढ़े और यूरिया पर निर्भरता घटे। हालांकि भारत अपने एनपीके उर्वरकों का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा घरेलू स्तर पर ही तैयार करता है, फिर भी उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली गैस और पोटाश जैसी कच्ची सामग्री के आयात पर निर्भरता अब भी एक बड़ी कमजोरी बनी हुई है।
कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि अप्रैल 2026 के दौरान जिस भारी सप्लाई झटके और कीमतों में उछाल का सामना भारत को करना पड़ा था, उस स्थिति से अब देश काफी हद तक उबर चुका है। समय पर टेंडर, आयात स्रोतों में विविधता, दीर्घकालिक समझौते और उर्वरक के वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा — इन सभी उपायों के मेल से सरकार रबी सीजन में किसानों को समय पर और तुलनात्मक रूप से सस्ता यूरिया उपलब्ध कराने की स्थिति में नजर आ रही है। हालांकि पश्चिम एशिया में स्थिति अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं है, ऐसे में आगे भी कीमतों और आपूर्ति पर करीबी नजर बनाए रखना जरूरी होगा।
