अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावा चोरी विवाद की जड़ें जून 2026 में मिलती हैं। यह घटना पहली बार 7 जून 2026 को सामने आई, जब राम मंदिर में चढ़ावे और नोटों की गिनती के दौरान नकदी और गहने चोरी होने के आरोप लगे। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार तुरंत हरकत में आई और 13 जून को उत्तर प्रदेश सरकार ने जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया।
SIT ने अपनी प्रारंभिक जांच तेज़ी से आगे बढ़ाई। 23 जून को SIT ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को सौंपी, और उसके बाद 25 जून को ट्रस्ट सदस्य कृष्ण मोहन की लिखित शिकायत पर पुलिस ने औपचारिक मामला दर्ज किया।
FIR और गिरफ्तारियां
प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आठ लोगों को नामजद किया। रामजन्मभूमि थाने में दर्ज पहली FIR में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ल, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा को नामजद किया गया, जिनमें से अधिकांश चढ़ावे की गणना और दान प्रबंधन के काम से जुड़े थे। गौर करने वाली बात यह रही कि शुरुआत से ही FIR में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा जैसे शीर्ष पदाधिकारियों के नाम शामिल नहीं थे।
आरोपियों में एक नाम खास तौर पर सुर्खियों में रहा — गिरफ्तार आरोपियों में चंपत राय के निजी ड्राइवर रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू मिश्रा का नाम भी शामिल था, और उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 306, 316, 317 सहित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गईं। जांच में सामने आया कि लवकुश मिश्रा चढ़ावे और नकदी गिनने वाले कर्मचारियों में शामिल था।
सभी आठों आरोपियों को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया और अदालत में पेश किया गया, जहां उन्हें न्यायिक हिरासत भेज दिया गया। कोर्ट ने सभी आठ आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा, और इस दौरान चंपत राय, अनिल मिश्रा तथा गोपाल राव से भी लंबी पूछताछ हुई। तलाशी के दौरान बड़ी रकम बरामद हुई — गिरफ्तार आठ आरोपियों के पास से करीब 79 लाख 85 हज़ार रुपये बरामद किए गए, हालांकि एक आरोपी सुभाष के पास से नकदी नहीं मिली फिर भी जांच में उसकी संलिप्तता सामने आई।
इस दौरान माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि अयोध्या के वकीलों ने चढ़ावा चोरी का केस लड़ने से इनकार कर दिया, और स्थानीय लोगों ने अनिल मिश्रा से अयोध्या छोड़ने की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी भी दी।
SIT की फाइनल रिपोर्ट: क्या निकला?
लगभग दो महीने की जांच के बाद SIT ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। विशेष जांच टीम (SIT) ने अपनी फाइनल रिपोर्ट राज्य शासन को सौंपी, जिसके बाद गृह विभाग ने रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद इसे आगे की कार्रवाई के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को उपलब्ध करा दिया।
रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह रहा कि ट्रस्ट के दो शीर्ष पदाधिकारियों को राहत मिली। SIT ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्ट सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा — दोनों को क्लीन चिट दे दी। रिपोर्ट में इस निष्कर्ष के पीछे तर्क भी स्पष्ट किया गया — अंतिम जांच रिपोर्ट में दोनों प्रमुख पदाधिकारियों को क्लीन चिट देते हुए यह भी कहा गया कि रिपोर्ट में किसी भी अनियमितता में उनकी संलिप्तता का कोई ज़िक्र नहीं मिला।
रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया कि चोरी असल में कैसे और किस स्तर पर हुई। जांच के दौरान पहली SIT टीम ने पाया कि दान राशि की गिनती के समय ट्रस्ट और संबंधित बैंक की निगरानी व्यवस्था में कुछ संस्थागत कमज़ोरियां और प्रक्रियात्मक चूकें थीं, जिनका अनुचित लाभ उठाकर निचले स्तर के कर्मियों ने गड़बड़ी को अंजाम दिया। लेकिन इन खामियों के बावजूद जांच एजेंसी को शीर्ष स्तर पर किसी साज़िश के सबूत नहीं मिले — चंपत राय और अनिल मिश्रा की किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष संलिप्तता या आपराधिक षड्यंत्र के साक्ष्य नहीं मिले, जिसके चलते उन्हें आधिकारिक तौर पर क्लीन चिट दी गई।
रिपोर्ट में जिम्मेदारी सीमित दायरे में तय की गई — जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट में मुख्य रूप से उन्हीं आठ लोगों के नाम शामिल हैं जिन्हें पुलिस ने वित्तीय अनियमितता और चोरी के आरोप में पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था, और इस केस में नामजद वे सभी आठ आरोपी अभी भी जेल में बंद हैं।
सवाल और आशंकाएं जो बरकरार हैं
- शुरुआत से ही चंपत राय और अनिल मिश्रा का नाम FIR में नहीं था — यानी जांच की दिशा शुरू से ही शीर्ष नेतृत्व की तरफ नहीं मुड़ी थी। आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि जब जांच के दायरे में शुरू से ही सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारी थे, तो “क्लीन चिट” कोई बड़ा खुलासा नहीं बल्कि अपेक्षित नतीजा था।
- यह जांच राज्य सरकार द्वारा गठित SIT ने की, जो अंततः उसी राज्य सरकार और ट्रस्ट प्रशासन को रिपोर्ट सौंपती है — इसमें किसी स्वतंत्र या न्यायिक निगरानी (जैसे कोर्ट-मॉनिटर्ड SIT) का ज़िक्र सार्वजनिक रिपोर्टों में नहीं मिलता, जो निष्पक्षता को लेकर पूरी तरह भरोसा दिलाने के लिए काफी नहीं माना जा सकता।
- ट्रस्ट की आंतरिक बैठक (2 सितंबर) में रिपोर्ट पर चर्चा होनी है — यानी अभी यह प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है; अंतिम निर्णय और सार्वजनिक पारदर्शिता (जैसे रिपोर्ट सार्वजनिक होगी या नहीं) पर स्पष्टता अभी बाकी है।
- स्थानीय स्तर पर असंतोष के संकेत मिले थे — वकीलों का केस लड़ने से इनकार करना और स्थानीय लोगों की नाराज़गी दिखाती है कि हर कोई मामले के इस मोड़ से संतुष्ट नहीं था, हालांकि यह जनभावना का मामला है, कानूनी तथ्य का नहीं।
कुल मिलाकर, यह क्लीन चिट “निर्दोष साबित होने” से ज़्यादा “जांच के दायरे से बाहर रखे जाने” जैसी प्रतीत होती है। जब तक कोई स्वतंत्र या न्यायिक समीक्षा नहीं होती, तब तक इस रिपोर्ट को अंतिम और निष्पक्ष सत्य मान लेना जल्दबाज़ी होगी। 2 सितंबर की ट्रस्ट बैठक में भी चूंकि फैसला वही लोग लेंगे जो पहले से ही जांच के दायरे से बाहर रह चुके पदाधिकारियों के करीबी हैं, इसलिए वहां से किसी बड़े बदलाव या आगे की स्वतंत्र जांच की मांग की संभावना कम ही दिखती है।
