PM CARES: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक ताज़ा रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल में कोविड-19 महामारी के दौरान हुए स्वास्थ्य प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में कोविड-19 के दौरान पीएम केयर्स और सीएसआर पहल के तहत लगाए गए पीएसए ऑक्सीजन संयंत्रों में से आधे से अधिक संयंत्र दिसंबर 2023 तक या तो शुरू ही नहीं हुए थे या फिर काम नहीं कर रहे थे।
रिपोर्ट में क्या-क्या मिला
कैग के निष्कर्ष बताते हैं कि आपातकालीन कोविड फंडिंग का बड़ा हिस्सा जमीन पर सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाया:
- ऑक्सीजन प्लांट बेकार: आधे से ज्यादा PSA ऑक्सीजन संयंत्र दिसंबर 2023 तक या तो चालू ही नहीं हुए, या काम करना बंद कर चुके थे।
- वेंटिलेटर और सांद्रक अनुपयोगी: दो सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सांद्रकों (कंसंट्रेटर) का इस्तेमाल तक शुरू नहीं किया गया।
- फंड का कम इस्तेमाल: आपात कोविड प्रतिक्रिया पैकेज (ECRP)-2 के तहत जो कुल राशि आवंटित हुई थी, उसका एक बड़ा हिस्सा मार्च 2022 तक खर्च नहीं हो पाया था।
- राज्य कोविड फंड भी अछूता: कोविड से निपटने के लिए राज्य को दी गई अतिरिक्त राज्य कोविड संयुक्त निधि का भी इस्तेमाल नहीं किया गया।
- देरी से पेश हुई रिपोर्ट: यह ऑडिट रिपोर्ट 2024 में विधानसभा में पेश हुई, जबकि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इससे पहले लगातार चार वित्तीय वर्षों की कैग रिपोर्टें विधानसभा में पेश नहीं की थीं।
कैग ने साफ कहा है कि यह स्थिति पश्चिम बंगाल की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और महामारी के दौरान संसाधनों के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
व्यापक राजनीतिक माहौल में आई यह रिपोर्ट
यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब देशभर में परीक्षा व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही को लेकर पहले से माहौल गरम है — NEET पेपर लीक के मुद्दे पर छात्र आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो चुका है और नए मंत्री प्रह्लाद जोशी ने अभी-अभी पदभार संभाला है। ऐसे माहौल में बंगाल की यह कैग रिपोर्ट भी सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और फंड के इस्तेमाल पर बहस को और हवा दे सकती है।
PM CARES फंड:
कोविड-19 जैसी किसी भी आपातकालीन या संकटपूर्ण स्थिति से निपटने और प्रभावित लोगों को राहत देने के उद्देश्य से ‘प्रधानमंत्री नागरिक सहायता एवं आपातकालीन स्थिति राहत कोष’ (PM CARES Fund) नाम से एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया गया, जिसे 27 मार्च 2020 को रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 के तहत नई दिल्ली में पंजीकृत किया गया। इस फंड को कोविड-19 के प्रकोप और भविष्य में ऐसी ही किसी महामारी की स्थिति में राहत कार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाना था।
फंड की संरचना
PM CARES फंड एक सार्वजनिक सहयोग ट्रस्ट है। भारत के प्रधानमंत्री इस फंड के पदेन अध्यक्ष हैं, जबकि रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके पदेन ट्रस्टी हैं। इसके अलावा जस्टिस के.टी. थॉमस (सेवानिवृत्त) जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी ट्रस्टी बोर्ड में शामिल किया गया था।
पारदर्शिता को लेकर विवाद
यह फंड शुरू से ही पारदर्शिता के सवालों को लेकर विवादों में रहा है:
- फंड के गठन से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। दान की गई कुल राशि और दानदाताओं के नामों का भी सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया गया, और फंड का ऑडिट भी निजी तौर पर करवाया गया है। भारत सरकार ने यह भी कहा है कि PM CARES फंड कोई “सार्वजनिक प्राधिकरण” नहीं है, जिसका मतलब है कि यह RTI (सूचना का अधिकार) कानून के दायरे में नहीं आता।
- फंड का गठन न तो किसी संसदीय कानून से हुआ और न ही किसी सरकारी अधिसूचना से — यह मार्च 2020 में कोविड राहत के लिए धन जुटाने के मकसद से बनाया गया एक ट्रस्ट है। दिल्ली हाईकोर्ट में इस पर सुनवाई भी हुई है, जहां सरकार ने अपने रुख को स्पष्ट करने की कोशिश की।
यही पारदर्शिता की कमी है जो अब बंगाल की कैग रिपोर्ट के साथ मिलकर एक नया सवाल खड़ा करती है — अगर फंड के इस्तेमाल का हिसाब-किताब ठीक से सार्वजनिक नहीं है, तो यह पता लगाना और मुश्किल हो जाता है कि आखिर करोड़ों की यह राशि जमीन पर असल में कहां और कैसे खर्च हुई, खासकर तब जब राज्यों में बने संयंत्र काम ही नहीं कर रहे।
PMNRF से अंतर
यह ध्यान देने वाली बात है कि PM CARES फंड, पुराने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से अलग है — PMNRF दशकों पुराना और अपेक्षाकृत अधिक स्थापित तंत्र है, जबकि PM CARES को कोविड महामारी के दौरान एक नई, अलग संस्था के रूप में बनाया गया।
निष्कर्ष
कैग की यह रिपोर्ट बताती है कि महामारी के दौरान आपातकालीन तौर पर जुटाई गई भारी-भरकम रकम — चाहे वह PM CARES से आई हो या CSR पहलों से — जमीनी स्तर पर सही ढंग से इस्तेमाल नहीं हो पाई। पश्चिम बंगाल में सैकड़ों करोड़ रुपये या तो खर्च ही नहीं हुए, या जो संयंत्र-उपकरण लगाए भी गए, वे बेकार पड़े रह गए। यह मामला अब राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर स्वास्थ्य सेवा प्रबंधन और आपातकालीन कोष की जवाबदेही पर एक अहम बहस को जन्म दे सकता है।
