E20: भारत ने पिछले साल (2025 के अंत में) पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) को पूरे देश में अनिवार्य कर दिया — यह लक्ष्य मूल रूप से 2030 के लिए तय था, लेकिन भारत ने यह लक्ष्य निर्धारित समय से पांच साल पहले ही हासिल कर लिया। सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटती है, विदेशी मुद्रा बचती है, कार्बन उत्सर्जन कम होता है और गन्ना/मक्का किसानों को फायदा मिलता है
लेकिन आम वाहन मालिकों की शिकायत अलग है — लोग सोशल मीडिया पर शिकायत कर रहे हैं कि यह मिश्रण उनके इंजन को नुकसान पहुंचा रहा है और गाड़ी का माइलेज घटा रहा है। सबसे बड़ी दिक्कत पुरानी गाड़ियों को लेकर है — 2023 से पहले बिकी लाखों कारें और बाइकें केवल 5% या 10% एथेनॉल मिश्रण के लिए ही बनी थीं।
ताज़ा हालात
1. अटॉर्नी जनरल के बयान से आग भड़की
विवाद तब और भड़का जब भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने एक अदालती सुनवाई में E20 को लेकर “experiment” (प्रयोग) शब्द इस्तेमाल किया, यह कहते हुए कि इसके नतीजे अगले साल ही सामने आएंगे। सरकार ने दावा किया कि यह बयान कभी दिया ही नहीं गया, लेकिन सुनवाई का एक वीडियो जिसमें वेंकटरमणी यह शब्द बोलते दिख रहे हैं, सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। वेंकटरमणी ने बाद में सफाई दी कि उनका मतलब एथेनॉल आपूर्ति की मात्रा से था, नीति से नहीं
2. मंत्री का बयान भी विवादों में
पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सफाई देते हुए कहा कि रेसिंग कारों में भी एथेनॉल इस्तेमाल होता है और उससे रफ्तार बढ़ती है, हां माइलेज थोड़ा घट सकता है — लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह तुलना बेतुकी है क्योंकि रेसिंग इंजन खासतौर पर एथेनॉल के लिए डिज़ाइन होते हैं और बार-बार रीबिल्ड होते हैं, जो आम गाड़ी मालिक के लिए संभव नहीं।
3. सड़कों पर विरोध
5 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर पर कांग्रेस समर्थक और सामाजिक कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला के नेतृत्व में सैकड़ों नाराज़ वाहन मालिकों ने प्रदर्शन किया। विपक्षी नेता प्रियंक खरगे ने सवाल उठाया कि जब सरकार का अपना अध्ययन अभी अधूरा है, तो नागरिकों से गाड़ी को नुकसान साबित करने को क्यों कहा जा रहा है।
4. कार कंपनियां भी घिरीं
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में खरीदी गई ऑडी Q3 की फ्यूल टैंक फ्लैप और यूज़र मैनुअल में केवल E5 और E10 ईंधन की सिफारिश की गई थी, जबकि 2024 मॉडल महिंद्रा स्कॉर्पियो के फ्यूल टैंक पर चेतावनी स्टिकर लगा था कि केवल पेट्रोल/E10 ईंधन इस्तेमाल करें। महिंद्रा ने सफाई दी कि उसके E20-कम्प्लायंट वाहन इस ईंधन के लिए ठीक हैं, लेकिन पुरानी गाड़ियों पर कुछ नहीं कहा।
5. सुप्रीम कोर्ट में मामला
इस हफ्ते एक नई जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई है जो पुरानी गाड़ियों के लिए एथेनॉल-मुक्त पेट्रोल का विकल्प मांगती है। इससे पहले भी अगस्त 2025 में वकील अक्षय मल्होत्रा की एक याचिका खारिज हो चुकी है। इसके अलावा एथेनॉल आपूर्ति आवंटन (2025-26) को लेकर भारत पेट्रोलियम की एक अलग याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति (status quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। यह साफ नहीं है कि नई याचिका पर कोर्ट सुनवाई करेगा या नहीं, क्योंकि पिछले साल इसी तरह की चुनौती खारिज हो चुकी है।
6. सरकार अड़ी हुई है, आगे और बढ़ोतरी की तैयारी
पीछे हटने के बजाय सरकार E22, E25, E27 और E30 जैसे और ऊंचे ब्लेंड के मानक पहले से अधिसूचित कर चुकी है, और डीज़ल में आइसोब्यूटानॉल मिलाने पर भी विचार चल रहा है — जबकि मौजूदा एक भी डीज़ल कार इसके लिए अनुरूप (compliant) नहीं है।
दूसरे देशों में यह मॉडल कैसे सफल रहा?
ब्राज़ील — दुनिया का सबसे साफ मॉडल
भारत के उलट, ब्राज़ील ने उपभोक्ताओं पर मिश्रण थोपने के बजाय उन्हें विकल्प दिया। 2000 के दशक की शुरुआत में ऊर्जा सुरक्षा और ग्लोबल वार्मिंग की चिंताओं ने फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों (FFV) को अपनाने में तेज़ी ला दी — उपभोक्ताओं को पेट्रोल या इथेनॉल गाड़ी में से एक चुनने के बजाय, दोनों तरह के ईंधन में चलने वाली गाड़ी दी गई, जिससे लोग पंप पर जो सस्ता हो वह ईंधन भर सकते थे
- 2003 में वोक्सवैगन ने पहली फ्लेक्स-फ्यूल कार लॉन्च की; यह इंजन गैसोलीन (लगभग 20-27% एनहाइड्रस एथेनॉल) से लेकर शुद्ध हाइड्रस एथेनॉल (E100) तक किसी भी अनुपात के मिश्रण पर बिना किसी प्रदर्शन गिरावट या मैकेनिकल बदलाव के चल सकता है।
- यह इसलिए तेज़ी से सफल हुआ क्योंकि 2006 तक देश में पहले से 33,000 पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल की सुविधा मौजूद थी — जो पुराने प्रो-अल्कूल कार्यक्रम की विरासत थी
- नतीजा: 2023 तक फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल नई हल्की गाड़ियों की करीब 90% से ज़्यादा बिक्री और लगभग 4 करोड़ गाड़ियों के मौजूदा बेड़े का 84.5% हिस्सा बन चुके थे।
- हालांकि यह भी याद रखना ज़रूरी है — ब्राज़ील ने यह सफर धीरे-धीरे तय किया। ब्राज़ील ने E20 जल्दी हासिल किया, फिर भी दशकों तक अपनी नीति सुधारता रहा, इसके बाद ही E25 और E30 तक पहुंचा, जबकि भारत ने यह पूरा सफर मुट्ठी भर वर्षों में तय कर दिया।
- एक असफलता का सबक भी है: 1980 के दशक के अंत में गिरते वैश्विक तेल दाम और बढ़ती चीनी की कीमतों ने उत्पादकों को एथेनॉल से दूर धकेल दिया, जिससे 1989-90 में ईंधन की किल्लत हुई और जनता का भरोसा टूट गया — यानी सब्सिडी-निर्भर मॉडल का जोखिम हमेशा बना रहता है।
अमेरिका
अमेरिका में ज़्यादातर पेट्रोल E10 (10% एथेनॉल) है, जबकि E15/E85 जैसे ऊंचे ब्लेंड सिर्फ फ्लेक्स-फ्यूल कम्पैटिबल गाड़ियों के लिए अलग से बेचे जाते हैं — यानी वहां भी विकल्प और लेबलिंग का सिस्टम है, जबरन एक ही मिश्रण थोपने का नहीं।
भारत की मुख्य चूक कहां रही?
भारत की अपनी नीति संस्था नीति आयोग ने 2021 में ही आगाह किया था कि उपभोक्ता स्वीकृति के लिए ऊंचे ब्लेंड को पेट्रोल से सस्ता रखना, टैक्स में छूट देना और खुदरा कीमतें घटाना ज़रूरी होगा — लेकिन ये उपाय लागू नहीं किए गए, जिससे यह विरोध और भड़का। यानी ब्राज़ील और अमेरिका दोनों जगह जहां उपभोक्ता को विकल्प और आर्थिक प्रोत्साहन मिला, भारत में सीधे अनिवार्यता थोप दी गई — यही मूल फर्क है जो आज के विवाद की जड़ में है।
