18 जुलाई 2026 की सुबह, दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर पर बैठे सोनम वांगचुक को उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले गई। बीस दिनों से अन्न का एक दाना न खाने वाले, आठ किलो से ज़्यादा वज़न गिरा चुके एक 59 वर्षीय शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता को पुलिस बलपूर्वक ले गई, समर्थकों को धरनास्थल खाली करने को कह दिया गया। यह किसी अपराधी की गिरफ़्तारी नहीं थी — यह एक ऐसे व्यक्ति के साथ हुआ, जिसने केवल इतना माँगा था कि सरकार शिक्षा व्यवस्था में हो रही गड़बड़ियों की ज़िम्मेदारी ले।
यही तस्वीर इस पूरे प्रकरण का सार बन गई है: एक तरफ़ एक आदमी अपनी जान की क़ीमत पर जवाबदेही माँग रहा है, दूसरी तरफ़ सरकार की तरफ़ से पिछले तीन हफ़्तों में एक भी औपचारिक बयान नहीं आया।
यह भूख हड़ताल शुरू कहाँ से हुई
सोनम वांगचुक कोई नए चेहरे नहीं हैं। लद्दाख के इंजीनियर, शिक्षा-सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में वे वर्षों से जाने जाते रहे हैं — फ़िल्म “3 इडियट्स” के फुनसुख वांगड़ू किरदार को उन्हीं के जीवन से प्रेरणा मिली थी। इससे पहले भी वे लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा और अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए अनशन कर चुके हैं, और हर बार उन्हें केंद्र सरकार से केवल आश्वासन ही मिले, ठोस नतीजे नहीं।
इस बार वे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन के समर्थन में जंतर-मंतर पहुँचे, यह कहते हुए कि सरकार ने अपने पुराने वादे पूरे नहीं किए और बातचीत की प्रक्रिया ठप पड़ गई है।उनका मुद्दा इस बार शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है — 28 जून 2026 को उन्होंने NEET-UG 2026 परीक्षा में हुए पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की माँग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की।
पेपर लीक कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं है — पिछले कुछ वर्षों में देश की बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार लीक और गड़बड़ियाँ सामने आई हैं, जिनसे लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है। CJP और वांगचुक की एकमात्र माँग साफ़ है: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें, ताकि व्यवस्था में जवाबदेही तय हो सके।
बीस दिन, एक चुप्पी
यह वह हिस्सा है जहाँ यह कहानी सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बन जाती है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार ने अब तक इस्तीफ़े की माँग पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। बीस दिन — जिसमें एक इंसान भूखा बैठा रहा, उसका शरीर टूटता गया, डॉक्टर बार-बार जाँच करते रहे — और सरकार की तरफ़ से पूरी अवधि में एक भी सार्थक बातचीत या बयान नहीं आया।
जब मंत्री की प्रतिक्रिया आई भी, तो वह संवाद के बजाय खारिज़ करने वाली थी। पिछले महीने धर्मेंद्र प्रधान ने एक टीवी इंटरव्यू में इन प्रदर्शनों को खारिज करते हुए CJP को “अराजक तत्वों की बी-टीम” बता दिया। एक ऐसे मंत्री के लिए, जिनके इस्तीफ़े की माँग पर पूरा आंदोलन टिका है, यह टिप्पणी सुनने और जवाब देने की ज़िम्मेदारी से बचने जैसी लगती है। जब जवाबदेही माँगी जा रही थी, जवाब में सिर्फ़ लेबल चस्पा किए गए।
भूख हड़ताल के 20 दिन पूरे होने पर डॉक्टरों ने अंग विफलता की चेतावनी दी, यानी यह अब सांकेतिक विरोध नहीं, जानलेवा स्थिति बन चुकी थी। इसके बावजूद सरकार की तरफ़ से बातचीत की कोई पहल सामने नहीं आई। वांगचुक ख़ुद कह चुके थे — ज़रूरत पड़ी तो जान चली जाए, लेकिन वे पीछे नहीं हटेंगे।
जबरन अस्पताल, और फिर सवालों की झड़ी
18 जुलाई को जो हुआ, उसने विवाद को नया मोड़ दे दिया। दिल्ली पुलिस भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले गई और समर्थकों को जंतर-मंतर खाली करने को कहा गया। यह किसी सहमति से लिया गया फ़ैसला नहीं लग रहा था — वांगचुक की पत्नी ने सफदरजंग अस्पताल को कड़ा संदेश लिखते हुए कहा कि बिना अनुमति कोई इलाज शुरू न किया जाए। एक कार्यकर्ता को, जिसने शांतिपूर्ण ढंग से अपना विरोध दर्ज कराया, पुलिस बल इस्तेमाल कर अस्पताल पहुँचा दिया गया — यह सवाल उठाता है कि क्या यह वाकई उसकी जान बचाने की चिंता थी, या असहज होते जा रहे आंदोलन को दिल्ली के मुख्य चौराहे से हटाने की कोशिश।
इस कार्रवाई के बाद विपक्ष ने सरकार को सीधे निशाने पर लिया। समाजवादी पार्टी सांसद डिंपल यादव ने इसे “लोकतंत्र और संविधान को कुचलना” बताया, वहीं आप सांसद संजय सिंह ने भी सरकार की कार्रवाई पर तीखे सवाल उठाए। कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा कि केंद्र ने वांगचुक से बात करने के बजाय उन्हें ज़बरन उठा लिया, और यह टिप्पणी की कि संवाद करना इस सरकार की फितरत में नहीं है। यह प्रतिक्रिया अकेले विपक्षी बयानबाज़ी नहीं — यह इस बात की गवाही है कि सरकार का रवैया कितने लोगों को असहज कर चुका है।
इसके बाद आंदोलन थमा नहीं। वांगचुक के अस्पताल जाने के बाद CJP अध्यक्ष अभिजीत दीपके खुद अनशन पर बैठ गए और लोगों से जंतर-मंतर पर जुटने की अपील की, साथ ही यह भी कहा कि अब सिर्फ़ शिक्षा मंत्री नहीं, बल्कि सीधे प्रधानमंत्री मोदी के इस्तीफ़े की माँग होनी चाहिए।
सरकार की निष्क्रियता: बड़ा सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे तीखा सवाल यही है — जब एक जानी-मानी, विश्वसनीय शख़्सियत सार्वजनिक तौर पर, शांतिपूर्ण ढंग से, अपनी जान जोखिम में डालकर तीन हफ़्तों तक विरोध दर्ज कराती रहे, तो सरकार का तीन हफ़्ते तक चुप रहना किस बात का संकेत है?
कुछ बिंदु इस निष्क्रियता को और स्पष्ट करते हैं:
- कोई औपचारिक संवाद नहीं: तीन हफ़्तों में सरकार की तरफ़ से बातचीत की कोई पहल सामने नहीं आई, जबकि मुद्दा — परीक्षा पेपर लीक — सीधे लाखों छात्रों और परिवारों को प्रभावित करता है।
- मुद्दे को खारिज करने की प्रवृत्ति: मंत्री की टिप्पणी ने आंदोलन को अराजकता से जोड़ने की कोशिश की, न कि उसमें उठाए गए ठोस सवालों का जवाब देने की।
- स्वास्थ्य चेतावनी के बावजूद निष्क्रियता: डॉक्टरों की अंग-विफलता की चेतावनी के बाद भी बातचीत शुरू करने के बजाय पुलिस कार्रवाई का सहारा लिया गया।
- विरोध स्थल को खाली कराना: वांगचुक को अस्पताल ले जाने के साथ ही समर्थकों को हटाया जाना, आंदोलन को सार्वजनिक नज़रों से दूर करने की कोशिश जैसा दिखता है।
यह पैटर्न नया नहीं है। वांगचुक पहले भी लद्दाख के मुद्दे पर भूख हड़ताल कर चुके हैं, और तब भी उन्हें ठोस कार्रवाई से ज़्यादा आश्वासन मिले। यह सवाल जायज़ है कि क्या सरकार जनांदोलनों को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें समय के साथ थमने देने या दबाने की रणनीति अपनाती है।
निष्कर्ष
सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल केवल एक व्यक्ति की ज़िद नहीं है — यह शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग है, जो सीधे तौर पर देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ी है। जब इतने बड़े मुद्दे पर सरकार तीन हफ़्तों तक चुप्पी साधे रखे, और आख़िरकार बातचीत की जगह पुलिस बल का इस्तेमाल करे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज़ को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। एक ज़िम्मेदार सरकार से अपेक्षा यही होती है कि वह विरोध को दबाने से पहले उसके पीछे के कारणों को सुने — यह प्रकरण दिखाता है कि यह अपेक्षा फ़िलहाल अधूरी ही रह गई है।
