केंद्र सरकार ने देश भर के घरों में रसोई गैस सिलेंडर (एलपीजी) के बजाय पाइप के जरिए मिलने वाली प्राकृतिक गैस (पीएनजी) के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का अभियान तेज कर दिया है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने हाल ही में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जिला स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है, ताकि पाइप वाली गैस का विस्तार तेजी से और व्यवस्थित तरीके से हो सके। यह कदम पिछले कुछ महीनों से चल रही एक बड़ी नीतिगत कवायद की अगली कड़ी है, जिसका मकसद है — देश की रसोई को एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता से धीरे-धीरे मुक्त कर पाइपलाइन आधारित गैस आपूर्ति की ओर ले जाना।
ताजा आदेश: हर जिले में नोडल अधिकारी और समन्वय समिति
पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने 21 अगस्त को सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर कहा कि खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारी इस काम के लिए सबसे उपयुक्त हैं, क्योंकि उनका एलपीजी वितरकों के साथ पहले से नियामकीय जुड़ाव है और उनकी फील्ड स्तर पर मजबूत प्रशासनिक पहुंच है। इसी आधार पर हर राज्य को कहा गया है कि वह जिला आपूर्ति अधिकारी स्तर से नीचे का न कोई अधिकारी पीएनजी समन्वय समिति (PNG Coordination Committee — PCC) से जोड़े।
ये समितियां शहर गैस वितरण (सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन) कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों के साथ मिलकर हर भौगोलिक क्षेत्र में काम करेंगी। इनका मुख्य दायित्व होगा:
- ऐसे घरों और आवासीय सोसायटियों की पहचान करना जहां पीएनजी कनेक्शन दिया जा सकता है
- सोसायटियों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों और व्यक्तिगत उपभोक्ताओं को औपचारिक नोटिस जारी करना
- जागरूकता शिविर और आउटरीच कैंप लगाना
- कनेक्शन देने की प्रक्रिया में तेजी लाना और उपभोक्ताओं की शिकायतों का समाधान करना
राज्यों से कहा गया है कि वे नामित अधिकारियों के नाम, पदनाम और संपर्क विवरण जल्द से जल्द भेजें, ताकि समितियां उनसे सीधे समन्वय कर सकें।
एक साथ एलपीजी और पीएनजी नहीं रख पाएंगे उपभोक्ता
इस पूरी कवायद का सबसे अहम और चर्चा में रहा पहलू यह है कि जहां पाइप वाली गैस उपलब्ध है, वहां उपभोक्ता एक साथ एलपीजी और पीएनजी दोनों कनेक्शन नहीं रख सकेंगे। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत नए आदेश अधिसूचित किए हैं, जिनके तहत जिन परिवारों को पीएनजी की सुविधा मिल चुकी है और जो इसके बावजूद नया पीएनजी कनेक्शन लेने के लिए आवेदन नहीं करते, उनकी एलपीजी आपूर्ति रोकी जा सकती है — बशर्ते उन्हें पहले उचित सूचना दी जाए।
यह नीति यूं तो नई नहीं है। इसकी शुरुआत मार्च 2026 में ही हो गई थी, जब पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक आदेश जारी कर कहा था कि जिन इलाकों में पीएनजी नेटवर्क पहले से मौजूद है, वहां के घरों को पाइप गैस अपनानी होगी, और सूचना के बावजूद ऐसा न करने पर तीन महीने बाद एलपीजी आपूर्ति बंद की जा सकती है। इसके तुरंत बाद उन उपभोक्ताओं के लिए जिनके पास पहले से दोनों कनेक्शन थे, एलपीजी सिलेंडर तत्काल प्रभाव से सरेंडर करने का निर्देश भी दिया गया था।
उपभोक्ताओं के लिए राहत का प्रावधान भी
हालांकि सरकार ने सख्ती के साथ-साथ आम उपभोक्ताओं की सहूलियत का भी ध्यान रखा है। मई 2026 में एलपीजी (आपूर्ति एवं वितरण का विनियमन) संशोधन आदेश जारी कर एक लचीली व्यवस्था बनाई गई। इसके तहत जो उपभोक्ता पीएनजी कनेक्शन लेते हैं, उनके पास दो विकल्प होते हैं —
- पीएनजी कनेक्शन मिलने के 30 दिनों के भीतर वे अपना एलपीजी कनेक्शन बंद करने का आवेदन दे सकते हैं, या
- वे एक “ट्रांसफर वाउचर” ले सकते हैं, जिससे भविष्य में अगर वे किसी ऐसे इलाके में शिफ्ट होते हैं जहां पीएनजी नेटवर्क नहीं है, तो वहां दोबारा एलपीजी कनेक्शन बहाल कराया जा सकेगा।
सरकार के अनुसार यह प्रावधान खासतौर पर तबादले वाली नौकरी करने वाले कर्मचारियों, प्रवासी परिवारों, किरायेदारों, छात्रों और उन परिवारों के लिए फायदेमंद है जो किसी ऐसे क्षेत्र में जा रहे हों जहां अभी पीएनजी की सुविधा नहीं पहुंची है।
आखिर यह तेजी क्यों? — पश्चिम एशिया संकट की भूमिका
इस पूरे अभियान के पीछे एक बड़ी वजह इस साल की शुरुआत में पश्चिम एशिया में पैदा हुआ संकट रहा। भारत अपनी घरेलू एलपीजी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, और इसकी आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर यह जलमार्ग बाधित हुआ, जिससे भारत की एलपीजी आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा। कई शहरों में सिलेंडर की किल्लत और घबराहट में बुकिंग जैसी स्थितियां भी सामने आईं।
इसी दौरान सरकार ने पीएनजी वाले घरों को प्राथमिकता के आधार पर एलपीजी कनेक्शन छोड़ने के लिए कहा, ताकि सीमित आपूर्ति उन परिवारों तक पहुंच सके जिनके पास पाइप गैस की सुविधा नहीं है। इसी संकट के दौरान लगभग 7.99 लाख पीएनजी कनेक्शनों को गैसीकृत किया गया और 2.87 लाख अतिरिक्त कनेक्शनों के लिए ढांचा तैयार किया गया — यानी कुल मिलाकर करीब 10.86 लाख कनेक्शन इसी अवधि में जुड़े। इस अनुभव ने सरकार के भीतर यह विश्वास मजबूत किया कि पाइप गैस नेटवर्क का विस्तार भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है।
अप्रैल 2026 में आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय के सचिवों ने संयुक्त समीक्षा बैठक कर देश के 110 चिह्नित भौगोलिक क्षेत्रों में पीएनजी ढांचे के विस्तार पर चर्चा की थी, जिसमें राज्यों, जिलों और शहरी स्थानीय निकायों को इस दिशा में संवेदनशील बनाने पर जोर दिया गया।
सरकार का तर्क: सुरक्षा, दक्षता और आत्मनिर्भरता
पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि पीएनजी न सिर्फ ज्यादा सुरक्षित और स्वच्छ ईंधन है, बल्कि यह देश के ऊर्जा बदलाव के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाता है। सिलेंडर ढोने और वितरित करने के बजाय सीधे पाइपलाइन से आपूर्ति होने से लॉजिस्टिक्स का बोझ घटता है, उपभोक्ता सुविधा बढ़ती है, और अरबों रुपये के सार्वजनिक-निजी निवेश से तैयार सिटी गैस ढांचे का बेहतर इस्तेमाल हो पाता है।
सरकार यह भी मानती है कि आयातित एलपीजी पर निर्भरता घटाकर और घरेलू व पाइपलाइन आधारित प्राकृतिक गैस आपूर्ति को मजबूत कर भारत अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक संकटों और समुद्री परिवहन में आने वाली रुकावटों के प्रति ज्यादा जुझारू बन सकता है।
राष्ट्रीय पीएनजी अभियान 2.0
इस दिशा में सरकार पहले से “नेशनल पीएनजी ड्राइव 2.0” चला रही है, जिसे मार्च 2026 में 30 जून तक के लिए बढ़ाया गया था ताकि पीएनजी विस्तार की रफ्तार बनी रहे। मार्च महीने में ही घरेलू, वाणिज्यिक, हॉस्टल, मेस और कैंटीन श्रेणियों को मिलाकर तीन लाख से ज्यादा कनेक्शन गैसीकृत किए गए थे, और 2.7 लाख से अधिक नए कनेक्शन जोड़े गए। साथ ही सरकार ने भरोसा दिलाया था कि पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और पीएनजी का देश में पर्याप्त भंडार मौजूद है।
आगे की राह
अब अगस्त 2026 के ताजा निर्देश के साथ सरकार इस अभियान को अगले चरण में ले जा रही है — यानी शहरी गैस कंपनियों और तेल कंपनियों के भरोसे छोड़ने के बजाय जिला प्रशासन को सीधे इस काम से जोड़ना। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि हर जिले में एक जवाबदेह अधिकारी हो जो सोसायटियों की पहचान, नोटिस जारी करने और कनेक्शन प्रक्रिया में तेजी लाने का काम देखे।
सरकार ने राज्यों से इस मामले को प्राथमिकता देने और समयबद्ध तरीके से पीएनजी की स्वीकार्यता बढ़ाने के प्रति प्रतिबद्ध रहने को कहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जिला प्रशासन की भागीदारी से देश के शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पाइप गैस कनेक्शन की रफ्तार कितनी तेज होती है, और उपभोक्ताओं को इस बदलाव में किन व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है — खासकर उन इलाकों में जहां पाइपलाइन ढांचा अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है।
