Close Menu
News Drift Media
  • दुनिया
  • बिजनेस
  • खबर विशेष
  • खेल
  • राज्य
  • रोजगार
  • शिक्षा
  • ई पेपर
  • ई पत्रिका
  • राष्ट्रीय
  • …
    • मनोरंजन
    • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • सोशल
Facebook X (Twitter) Instagram YouTube WhatsApp
Facebook X (Twitter) Instagram YouTube WhatsApp
News Drift Media
E - Papers
  • दुनिया
  • बिजनेस
  • खबर विशेष
  • खेल
  • राज्य
  • रोजगार
  • शिक्षा
  • ई पेपर
  • ई पत्रिका
  • राष्ट्रीय
  • …
    • मनोरंजन
    • लाइफस्टाइल
    • स्वास्थ्य
    • सोशल
News Drift Media
Home»राष्ट्रीय»तुकाराम मुंढे का FDA एक्शन क्यों पड़ रहा भारी? हाईकोर्ट ने कहा—”अधिकारी न कानून जानते हैं, न नियम”
राष्ट्रीय

तुकाराम मुंढे का FDA एक्शन क्यों पड़ रहा भारी? हाईकोर्ट ने कहा—”अधिकारी न कानून जानते हैं, न नियम”

NDMBy NDMAugust 30, 2026No Comments5 Mins Read
Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email WhatsApp
Follow Us
Google News Facebook X (Twitter) Instagram Pinterest YouTube WhatsApp Telegram
तुकाराम मुंढे का FDA एक्शन क्यों पड़ रहा भारी? हाईकोर्ट ने कहा—”अधिकारी न कानून जानते हैं, न नियम”
Share
Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) कमिश्नर तुकाराम मुंढे अपनी सख्त और बेबाक कार्यशैली के लिए हमेशा से चर्चा में रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी आक्रामक कार्रवाई खुद उन्हीं और उनके विभाग पर भारी पड़ती दिख रही है। बॉम्बे हाईकोर्ट की अलग-अलग बेंचों ने पिछले एक महीने में कम से कम 11 मामलों में FDA के लाइसेंस निलंबन के आदेशों को या तो रद्द किया है या उन पर रोक लगाई है। सवाल यह उठता है कि आखिर एक ऐसा अधिकारी, जिसे लोग “रियल लाइफ सिंघम” कहते हैं, अदालत की इतनी तीखी फटकार क्यों झेल रहा है?

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर के पांच रेस्टोरेंट व कैंटीनों के लाइसेंस निलंबन के मामले में सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि अधिकारी न तो अदालत का आदेश समझते हैं और न ही कानून। कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि विभाग के अधिकारी अपने ही नियम नहीं पढ़ते और सीधे कार्रवाई कर देते हैं। एक अन्य सुनवाई में कोर्ट ने और भी तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “मच्छर मारने के लिए तलवार नहीं चलाई जाती”—यानी छोटी-मोटी खामियों के लिए भी FDA सीधे लाइसेंस निलंबित करने जैसा अत्यधिक कदम उठा रहा है। इसी सुनवाई में कोर्ट ने MCA के पांचों प्रतिष्ठानों को तुरंत प्रभाव से दोबारा खोलने की अनुमति दे दी।

दो महीने में जबरदस्त कार्रवाई का आंकड़ा

तुकाराम मुंढे के नेतृत्व में FDA ने बीते कुछ महीनों में बड़े पैमाने पर छापेमारी अभियान चलाया है। 25 मई से 31 जुलाई के बीच विभाग ने कुल 3,137 खाद्य प्रतिष्ठानों की जांच की, जिनमें से 764 को सुधार नोटिस जारी किए गए और 165 के लाइसेंस निलंबित कर दिए गए। इस दौरान करीब 55.72 करोड़ रुपये मूल्य का 28.6 लाख किलोग्राम खाद्य स्टॉक भी जब्त किया गया। अकेले होटल, रेस्तरां और ढाबों की बात करें तो 890 प्रतिष्ठानों की जांच में से 116 के लाइसेंस सस्पेंड कर दिए गए। आंकड़े बताते हैं कि यह कार्रवाई किसी छिटपुट अभियान की तरह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और बड़े पैमाने की मुहिम की तरह चलाई गई—लेकिन इसी रफ्तार और सख्ती ने अदालत में विभाग को कठघरे में ला खड़ा किया।

किन मामलों में हुई सबसे बड़ी किरकिरी?

अदालत में सबसे ज्यादा चर्चा में रहा पुणे की गुरुनानक डेयरी एंड स्वीट्स का मामला। इस दुकान ने दोबारा जांच में 36 में से 35 मानकों यानी करीब 98 प्रतिशत पर खरा उतरने के बावजूद अपना निलंबन 34 दिनों तक झेला। हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को पूरी तरह गैर-जरूरी करार देते हुए FDA को दुकान मालिक को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश तक दे डाला। खुद तुकाराम मुंढे ने इस फैसले पर हैरानी जताई थी।

इसी तरह नवी मुंबई के पवन बार ने अपने अनुपालन स्तर को 63 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक पहुंचा दिया था, फिर भी उसका निलंबन नहीं हटाया गया—जिसे कोर्ट ने रद्द किया। पुणे स्थित सिप्ला फार्मा की एक यूनिट का लाइसेंस रद्द करने का आदेश भी अदालत की फटकार के बाद वापस लेना पड़ा। नवी मुंबई के एक फाइव स्टार होटल के मामले में तो कोर्ट ने यहां तक कहा कि निरीक्षण के अगले ही दिन लाइसेंस सस्पेंड कर देना गलत है, और व्यापारियों को सुधार का तथा अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिलना चाहिए। कोर्ट ने एक बेहद अहम उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि इसी तरह अगर किसी अस्पताल का लाइसेंस अचानक रद्द कर दिया जाए, तो इससे सीधे मरीजों की जान पर बन आ सकती है। औरंगाबाद बेंच ने दूध विक्रेताओं के निलंबन पर रोक लगाई, तो नागपुर बेंच ने वर्धा की 80 साल पुरानी एक डेयरी को यह कहते हुए राहत दी कि सिर्फ एक उत्पाद में खामी मिलने पर पूरे प्रतिष्ठान को बंद करना उचित नहीं है। मुंबई के पूर्णिमा रेस्तरां मामले में तो कोर्ट ने निजी और सरकारी प्रतिष्ठानों के बीच भेदभाव पर सवाल उठाते हुए FDA को हाईकोर्ट परिसर की अपनी कैंटीनों की भी जांच करने पर मजबूर कर दिया।

कानून क्या कहता है, और कहां हो रही चूक?

इस पूरे विवाद की जड़ में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट (FSSAI Act) की धारा 32 का प्रावधान है। इस धारा के मुताबिक सामान्य खामियां मिलने पर पहले सुधार का नोटिस देना अनिवार्य है, और तुरंत लाइसेंस निलंबित करने का कदम सिर्फ ऐसी असाधारण आपातकालीन स्थिति में ही उठाया जा सकता है, जहां जनस्वास्थ्य को सीधा और गंभीर खतरा हो—और इसके कारण भी लिखित रूप में स्पष्ट दर्ज होने चाहिए। कई मामलों में अदालत ने पाया कि FDA ने इस प्रक्रिया का पालन किए बिना ही सीधे सख्त कार्रवाई कर दी, जो कानूनी रूप से गलत ठहराई गई।

दूसरी तरफ, तुकाराम मुंढे और उनके विभाग का पक्ष यह है कि औचक छापों में अत्यधिक गंदगी, असुरक्षित भोजन और स्वच्छता की भारी अनदेखी पाई गई थी, और लाइसेंस सिर्फ गंभीर स्वास्थ्य जोखिम की स्थिति में ही निलंबित किए गए। उनका दावा है कि विभाग बिना किसी भेदभाव के सभी पर एक समान नियम लागू कर रहा है।

Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Email
NDM
  • Website

Related Posts

महंगाई की मार: दालों की कीमतों में उछाल, अरहर 20 रुपये महंगी

September 24, 2026

SIR पर चुनाव आयोग में मतभेद, दो आयुक्तों ने 10 माह में 14 बार दर्ज कराई आपत्ति

September 24, 2026

चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोप, तत्काल हटाने की मांग

September 24, 2026
Leave A Reply Cancel Reply

© 2026 Newsdrift - All Right Reserved | Designed & Develoved By Aimsoftnet
  • Terms & Conditions
  • Privacy Policy
  • Disclaimer
  • Refund Policy
  • Advertise with us
  • Contact us

Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.