मिजोरम के विवाह, तलाक और संपत्ति विरासत से जुड़े कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दाखिल की गई है। उद्यमी और कांग्रेस नेता मेरियम एल. ह्रांगचल ने मिजो मैरिज, डिवोर्स एंड इनहेरिटेंस ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 2014 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कानून के कुछ प्रावधान मिजो महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं, खासकर तब जब वे मिजो समुदाय से बाहर के पुरुष से शादी करती हैं।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि याचिका में विवाह के साथ-साथ महिलाओं के संपत्ति और विरासत के अधिकार तथा संविधान के तहत समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का सवाल उठाया गया है।
क्या है 2014 का मिजो मैरिज एक्ट?
मिजोरम विधानसभा ने Mizo Marriage, Divorce and Inheritance of Property Act, 2014 को विवाह, तलाक और संपत्ति की विरासत से जुड़े मामलों के लिए बनाया था। कानून का उद्देश्य मिजो समुदाय से जुड़े पारंपरिक नियमों को कानूनी ढांचे में लाना था। अधिनियम की धारा 2 के मुताबिक, यह कानून किसी मिजो जनजाति से संबंधित व्यक्ति पर लागू होता है और उन विवाहों पर भी लागू होता है जिनमें पक्षों में पुरुष मिजो जनजाति से संबंधित हो।
यही प्रावधान अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का मुख्य आधार बना है।
मिजो महिलाओं के अधिकारों को लेकर क्या आपत्ति?
याचिकाकर्ता मेरियम ह्रांगचल का कहना है कि कानून की मौजूदा व्यवस्था मिजो पुरुष और गैर-मिजो महिला के विवाह को तो अपने दायरे में रखती है, लेकिन मिजो महिला और गैर-मिजो पुरुष के विवाह के मामले में समान स्थिति नहीं बनती।
याचिका में दावा किया गया है कि इसका असर ऐसी मिजो महिलाओं के विवाह, संपत्ति और विरासत से जुड़े अधिकारों पर पड़ सकता है, जो समुदाय से बाहर शादी करती हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि केवल विवाह के आधार पर महिला को उसके सामुदायिक कानूनी अधिकारों से अलग करना समानता के संवैधानिक सिद्धांत पर सवाल खड़ा करता है।
संपत्ति और विरासत का मामला क्यों अहम?
2014 के कानून में परिवार की संपत्ति और विरासत से जुड़े विस्तृत प्रावधान हैं। कानून में परिवार के मुखिया की संपत्ति, महिला की निजी संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों को लेकर अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं। उदाहरण के लिए, धारा 32 महिला की निजी संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि गैर-मिजो पुरुष से शादी करने वाली मिजो महिलाओं और ऐसी शादियों से पैदा होने वाले बच्चों को उस कानूनी ढांचे का पूरा लाभ नहीं मिल पाता, जो मिजो पुरुष से विवाह करने वाली महिलाओं के मामले में उपलब्ध है।
अनुच्छेद 14 और 21 का दिया हवाला
मेरियम ह्रांगचल ने कानून के इन प्रावधानों को संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए चुनौती दी है। उनका कहना है कि प्रावधानों के कारण मिजो महिलाओं के साथ समान व्यवहार नहीं होता और उनकी गरिमा, समानता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार प्रभावित होते हैं।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि किसी महिला की सामुदायिक पहचान और उससे जुड़े अधिकार केवल इसलिए कम नहीं किए जाने चाहिए क्योंकि उसने अपनी पसंद से किसी गैर-मिजो व्यक्ति से विवाह किया है।
अपने विवाह का भी दिया उदाहरण
मेरियम ह्रांगचल ने अपनी व्यक्तिगत वैवाहिक स्थिति का उदाहरण देते हुए अदालत के सामने इस कानून के व्यावहारिक प्रभाव का मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था मिजो महिलाओं की स्वतंत्र कानूनी पहचान को प्रभावित करती है और उन्हें उन अधिकारों से वंचित कर सकती है, जो इसी कानून के तहत मिजो पुरुषों से विवाह करने वाली महिलाओं को मिलते हैं।
याचिका में विशेष रूप से इस असमानता को चुनौती दी गई है कि मिजो पुरुष और गैर-मिजो महिला के विवाह को कानून में जगह मिलती है, जबकि मिजो महिला और गैर-मिजो पुरुष के विवाह को उसी तरह शामिल नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मेरियम ह्रांगचल की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई हुई। पीठ ने मामले में उठाए गए संवैधानिक सवाल को महत्वपूर्ण माना और यह भी पूछा कि याचिकाकर्ता ने पहले हाई कोर्ट का रुख क्यों नहीं किया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने बताया कि मिजोरम का समुदाय छोटा होने के कारण उन्हें आशंका थी कि अगर मामले की सुनवाई गुवाहाटी हाई कोर्ट की आइजोल बेंच में हुई तो उनकी सुरक्षा को लेकर परेशानी हो सकती है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस चिंता को ध्यान में रखते हुए गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि मामले की सुनवाई गुवाहाटी में ही की जाए और याचिका को आइजोल बेंच में न भेजा जाए।
अब आगे क्या होगा?
मामले की अगली कानूनी प्रक्रिया गुवाहाटी हाई कोर्ट में होगी। वहां यह जांचा जाएगा कि 2014 के कानून के जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, वे संविधान के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों के अनुरूप हैं या नहीं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। मामला अब इस बात पर केंद्रित होगा कि मिजो महिलाओं के विवाह, संपत्ति और विरासत से जुड़े अधिकारों के मामले में कानून की मौजूदा व्यवस्था संवैधानिक कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं।
