देशभर की अदालतों में 4,192 आपराधिक मामले मौजूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित हैं। यह जानकारी वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी 22वीं एमिकस क्यूरी रिपोर्ट के तौर पर दी है। हंसारिया को सांसदों-विधायकों के खिलाफ मामलों के त्वरित निस्तारण की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) में एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया है। यह याचिका भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दाखिल की थी।
मामलों की स्थिति — आंकड़ों में
| श्रेणी | संख्या |
|---|---|
| कुल लंबित मामले | 4,192 |
| 5 से 10 साल से लंबित | 754 |
| 3 से 5 साल से लंबित | 562 |
| 3 साल से कम समय से लंबित | 1,095 |
| जांच अभी भी लंबित (700 मामले) | 700 |
| 3 साल से चार्जशीट दाखिल नहीं हुई | 360 |
| हाईकोर्ट वेबसाइटों पर कुल लंबित मामले | 4,442 |
10 साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों की संख्या 519 बताई गई है।
किस राज्य में सबसे ज्यादा मामले?
रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा लंबित मामलों वाले राज्य/हाईकोर्ट इस प्रकार हैं:
- उत्तर प्रदेश — 1,171 मामले (सबसे ज्यादा)
- केरल — 543 मामले
- बिहार — 373 मामले
- महाराष्ट्र — 364 मामले
- ओडिशा — 330 मामले
(UP का यह 1,171 का आंकड़ा इलाहाबाद हाईकोर्ट की वेबसाइट से फरवरी 2024 तक की स्थिति के आधार पर लिया गया है)
मुख्यमंत्रियों पर मामले
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी पर सबसे ज्यादा 89 मामले दर्ज हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी पर 29 और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर 19 मामले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।
सांसदों की स्थिति (लोकसभा-राज्यसभा)
लोकसभा के 543 सदस्यों में से 251 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 170 गंभीर आपराधिक मामले (5 साल या उससे अधिक की सजा वाले) हैं। राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 (33%) सांसदों पर आपराधिक मामले हैं, जिनमें से 40 (18%) गंभीर मामले हैं। यह आंकड़े एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट पर आधारित बताए गए हैं।
राज्यवार सांसदों में आपराधिक मामलों का प्रतिशत भी दिलचस्प है — केरल के 20 में से 19 सांसद (95%) आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं, तेलंगाना के 17 में से 14 (82%), ओडिशा में 76% और झारखंड में 71% सांसदों पर मामले दर्ज हैं। वहीं हरियाणा और छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक-एक सांसद पर मामला है।
पिछले सालों से तुलना — मामलों की संख्या घटी नहीं
यह आंकड़ा वर्षों से लगातार ऊंचा बना हुआ है, हालांकि इसमें उतार-चढ़ाव देखा गया:
- दिसंबर 2018: 4,110-4,122 मामले
- अक्टूबर 2020: 4,859 मामले
- नवंबर 2022: 5,140 मामले (सबसे ज्यादा)
- जुलाई 2026 (मौजूदा): 4,192 मामले
2018 के बाद 2,775 मामलों के निस्तारण के बावजूद कुल मामलों की संख्या 4,122 से बढ़कर 4,192 तक पहुंच गई थी — यानी नए मामले पुराने मामलों के निपटारे से भी तेज़ रफ्तार से जुड़ते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देश:
- 2017: सुप्रीम कोर्ट ने 10 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में सांसदों-विधायकों के आपराधिक मामलों की तेज़ सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें बनाने का आदेश दिया।
- दिसंबर 2018: हर जिले में एक विशेष सेशन कोर्ट और एक मजिस्ट्रेट कोर्ट तय करने का निर्देश।
- नवंबर 2023: सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को स्वतः संज्ञान (suo motu) याचिका दर्ज कर निगरानी करने और विशेष बेंच बनाने का निर्देश।
- फरवरी 2025: मामला तीन-जजों की बेंच को भेजा गया, क्योंकि पिछली रिपोर्ट में हाईकोर्ट स्तर पर निगरानी की कमी उजागर हुई थी।
- 18 अगस्त 2026: मामला तीन-जजों की बेंच के सामने सुनवाई के लिए सूचीबद्ध।
बावजूद इन निर्देशों के, पेंडेंसी लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है। देरी की वजहें बताई गई हैं:
- विशेष अदालतों पर सामान्य न्यायिक कार्य का बोझ
- सुनवाइयों का बार-बार टलना
- आरोपियों का अदालत में हाज़िर न होना
- गवाहों को पेश करने में दिक्कत
- हाईकोर्ट द्वारा अपर्याप्त निगरानी
एमिकस की नई सिफारिशें
हंसारिया ने इस बार सुप्रीम कोर्ट से कुछ ठोस कदमों की मांग की है:
- लगातार दो सुनवाइयों में हाज़िर न होने वाले आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी हों
- विशेष अदालतें केवल सांसदों-विधायकों के मामलों की सुनवाई करें, जब तक ये मामले निपट न जाएं
- 3 साल से ज्यादा पुराने मामलों की रोज़ाना सुनवाई (day-to-day trial) हो
- गवाहों को सुरक्षित रखने के लिए नोडल प्रॉसिक्यूशन अधिकारी नियुक्त हों
- हाईकोर्ट वेबसाइट पर मामलों का डेटा और आदेश रियल-टाइम अपलोड हों
- आरोप तय होने के एक साल के भीतर ट्रायल पूरा हो
- हाईकोर्ट हर महीने 3 साल से ज्यादा पुराने मामलों की निगरानी करें और हर मामले की “माइक्रो-मॉनिटरिंग” करें
