UPI : केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने शनिवार (8 अगस्त) को स्पष्ट किया कि यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के जरिए भुगतान करने वाले आम उपभोक्ताओं पर किसी भी तरह का लेनदेन शुल्क नहीं लगेगा और सभी व्यक्ति-से-व्यक्ति (पर्सन-टू-पर्सन) लेनदेन पूरी तरह मुफ्त बने रहेंगे। हालांकि मंत्रालय ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में जब कभी एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लागू किया जाएगा, तो वह एक निश्चित सीमा (थ्रेशोल्ड) से ऊपर के और सीमित दायरे के व्यापारी लेनदेन पर ही, बहुत मामूली दर से लगेगा — जो डेबिट या क्रेडिट कार्ड पर लगने वाले एमडीआर से काफी कम होगा।
एमडीआर क्या है और अभी स्थिति क्या है
एमडीआर वह शुल्क है जो बैंक लेनदेन की प्रोसेसिंग, सेटलमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत पूरी करने के लिए व्यापारियों से वसूलते हैं। क्रेडिट कार्ड पर यह लेनदेन मूल्य का 1-3% तक और डेबिट कार्ड पर 0.9% तक हो सकता है। इसके उलट, भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 (Payment and Settlement Systems Act) की धारा 10A के तहत आयकर अधिनियम की धारा 269SU में अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों — बीएचआईएम-यूपीआई, रुपे डेबिट कार्ड और यूपीआई-क्यूआर कोड — पर अभी किसी भी बैंक या सिस्टम प्रोवाइडर को कोई शुल्क लगाने की अनुमति नहीं है। यही वजह है कि अभी तक यूपीआई पूरी तरह “जीरो एमडीआर” व्यवस्था पर चल रहा है।
संसद में पास हुआ संशोधन विधेयक
गुरुवार (6 अगस्त) को लोकसभा ने द टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 पारित किया। इस विधेयक का मकसद भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10A में संशोधन करना है, ताकि जीरो-चार्ज की अनिवार्यता से छूट हटाई जा सके — शुरुआती प्रावधान के मुताबिक यह छूट 50 करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक कारोबार वाले व्यवसायों के लिए हटाई जा सकती है। उद्योग जगत के अधिकारियों का कहना है कि यही टर्नओवर सीमा तय करेगी कि किन व्यापारियों पर एमडीआर लागू होगा, हालांकि कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह सीमा इससे भी नीचे, करीब 1-1.5 करोड़ रुपये तक रखी जा सकती है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को कहा था कि इस बारे में अंतिम फैसला भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की अगुवाई वाली यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी करेगी, और 50 करोड़ रुपये से कम टर्नओवर वाले व्यापारियों को शुल्क से छूट मिलती रहेगी।
आंकड़े क्या कहते हैं — FY26 में यूपीआई लेनदेन
वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई लेनदेन के टिकट-साइज़ (राशि) के हिसाब से बंटवारा इस प्रकार है:
इससे स्पष्ट है कि व्यापारियों को होने वाले 86% भुगतान 500 रुपये से कम राशि के हैं — यानी छोटे किराना दुकानदारों और रोज़मर्रा की खरीद पर एमडीआर का सीधा असर सीमित ही रहने की उम्मीद है। हालांकि दिलचस्प बात यह है कि केवल 4% P2M लेनदेन (2,000 रुपये से ऊपर वाले) मूल्य के लिहाज से यूपीआई भुगतान के लगभग दो-तिहाई हिस्से के बराबर हैं — यानी बड़े लेनदेन की संख्या कम होने के बावजूद, कुल कारोबार में उनका योगदान बहुत बड़ा है। संभावना है कि सरकार एमडीआर को इन्हीं बड़े-मूल्य वाले लेनदेन पर केंद्रित रखे।
यूपीआई मुफ्त रखने की लागत — सालाना 20,000 करोड़ रुपये
2016 में लॉन्च होने के बाद से यूपीआई ने भुगतान को आसान और सस्ता बना दिया, जटिल बैंक विवरणों की जगह क्यूआर कोड ने ले ली, लेकिन इसे मुफ्त रखने की एक बड़ी वित्तीय कीमत भी है। अनुमान है कि यह लागत अब करीब 20,000 करोड़ रुपये सालाना है, जिसे फिलहाल बैंक और अन्य वित्तीय तंत्र से जुड़े हितधारक (payment service providers, third-party apps) खुद वहन कर रहे हैं। नए विधेयक के पास होने के बाद बैंकों को उम्मीद है कि उन्हें अब इस लागत की भरपाई (compensation) मिल सकेगी।
सरकार की प्रोत्साहन (इंसेंटिव) योजना
सरकार ने रुपे डेबिट कार्ड और कम-मूल्य के यूपीआई लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए एक इंसेंटिव योजना चला रखी है, जिसमें लेनदेन मूल्य के 0.15% तक की राशि बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडरों और थर्ड-पार्टी ऐप प्रोवाइडरों के बीच साझा की जाती है। संसदीय स्थायी समिति (वित्त) के अनुसार, इस योजना के तहत 2021-22 से 2024-25 के बीच केंद्र ने करीब 8,730 करोड़ रुपये का भुगतान किया, जबकि उद्योग की वास्तविक लागत का यह भुगतान महज 11% ही कवर करता है।
इसके अलावा थर्ड-पार्टी यूपीआई ऐप्स (जैसे PhonePe, Google Pay) के लिए बाज़ार हिस्सेदारी की 30% सीमा तय करने का प्रस्ताव भी लंबित है, जिसे कई बार टाला जा चुका है — मौजूदा समयसीमा दिसंबर 2026 है। वॉलमार्ट-स्वामित्व वाली PhonePe और Google Pay मिलकर देश के करीब 80% यूपीआई लेनदेन संभालती हैं, इसलिए यह सीमा लागू होने पर बाज़ार की संरचना पर बड़ा असर पड़ सकता है।
विपक्ष और उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए इसे “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और आरोप लगाया कि यह बैंकों व भुगतान प्रदाताओं के लिए यूपीआई और रुपे पर शुल्क लगाने का रास्ता खोलता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की नेशनल ट्रेड एस्टिमेट रिपोर्ट 2026 में भारत की यूपीआई/रुपे नीतियों को वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी भुगतान प्लेटफॉर्मों के लिए “अनुचित और भ्रामक” (unfair and misleading) बताया गया है, ऐसे समय में सरकार का यह कदम घरेलू भुगतान तंत्र को कमजोर कर सकता है।
भुगतान उद्योग के विशेषज्ञों ने हाल के दिनों में स्पष्ट किया है कि छोटे व्यापारी जैसे किराना दुकानदारों को कोई एमडीआर शुल्क नहीं देना होगा, क्योंकि छूट की सीमा उनके लिए काफी ऊंची रखी जा सकती है।
लोकल सर्कल्स सर्वे
एक जनमत सर्वेक्षण (Local Circles) में शामिल 20,000 से अधिक लोगों में से मात्र 2% उत्तरदाताओं ने कहा कि सभी यूपीआई भुगतानों पर एमडीआर लगाया जाना चाहिए — यानी आम जनता के बीच यूपीआई को मुफ्त बनाए रखने की भावना काफी मजबूत है।
निष्कर्ष: आगे क्या
सरकार का रुख साफ है कि आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारी यूपीआई पर किसी शुल्क से प्रभावित नहीं होंगे, लेकिन बड़े कारोबार (शुरुआती संकेतों के अनुसार 50 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर, संभवतः इससे भी कम सीमा) वाले व्यापारियों के लिए एक “नाममात्र” एमडीआर की शुरुआत हो सकती है। इसके पीछे तर्क यह है कि यूपीआई तंत्र को चलाने की करीब 20,000 करोड़ रुपये सालाना की लागत का बोझ अकेले बैंकों और भुगतान कंपनियों पर डालना दीर्घकाल में टिकाऊ नहीं है। हालांकि विपक्ष और डिजिटल भुगतान से जुड़े हितधारकों की चिंता है कि इससे यूपीआई की “मुफ्त और सर्वसुलभ” पहचान प्रभावित हो सकती है, साथ ही यह अमेरिकी व्यापार दबाव के बीच वीज़ा-मास्टरकार्ड जैसे विदेशी नेटवर्कों के लिए रास्ता खोलने की आशंका भी पैदा करता है। अंतिम फैसला एनपीसीआई की अगुवाई वाली यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी को करना है, इसलिए वास्तविक थ्रेशोल्ड और शुल्क दर पर स्पष्टता आना अभी बाकी है।
